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चौपालः दिमाग की बत्ती

देश के प्रधानसेवक चिंतित हैं कि ‘लालबत्ती केवल गाड़ियों से ही नहीं बल्कि दिमागों से भी विदा होनी चाहिए!’ चिंता वाजिब है।

Author May 6, 2017 03:13 am
विजय गोयल की कार से लाल बत्ती हटाता ड्राइवर (पीटीआई)

देश के प्रधानसेवक चिंतित हैं कि ‘लालबत्ती केवल गाड़ियों से ही नहीं बल्कि दिमागों से भी विदा होनी चाहिए!’ चिंता वाजिब है। लालबत्तियां दिमागों में रुतबे की आरामगाह बन चुकी हैं। तंत्र के बड़े-बड़े आलीशान दिमागों में जिम्मेदारियों की जगह लालबत्तियों ने अपने हकों के अतिक्रमण कर रखे हैं। ये दिमाग भले संवेदनशून्य न हों, मगर घमंड-विहीन कतई नहीं हैं। इनके भीतर लालबत्तियां जब-तब टिमटिमाने लगती हैं। अपने रुतबे के वीआइपी हूटर बजाने लगती हैं। कहीं-कहीं तो लोकतंत्र के रखवाले विचार भी लाल रंग में रंग कर तानाशाह जैसे हो जाते हैं। लाल रंग का प्रताप होता ही ऐसा होता है। जो भी उसकी जद में आता है वह उसमें निहित ‘पॉवर’ के चलते रसूख भरा लोक-व्यवहार करने लगता है। आप तो जानते ही हैं कि लाल-बत्तियां जब अपने हूटर बजाती हैं, तब अच्छे-अच्छे प्रोटोकॉल अनुशासन की रौ में बह कर लालबत्ती के सम्मान में झुक जाया करते हैं। लोकतंत्र का ‘लोक’ बेचारा सड़क के हाशिए पर एक दब्बू आदमी जैसा खड़ा होकर राजशाही ‘तंत्र’ को सम्मान की सलामी ठोकने लगता है। कुलजमा, गंगा एकदम उलट ही बहने लगती थी। लोकतंत्र का राजा यानी प्रजा, लोकतंत्र के सेवक यानी शासक की अर्दली बन कर उसके इंतजार में पलक-पांवड़े बिछाने तक को अभ्यस्त दिखाई पड़ती थी। यह सब लालबत्ती का ही तो किया-धरा था!

अब-जब लाल बत्ती को देश निकाले की तर्ज पर ‘तंत्र-निकाला’ दे दिया गया है, तब लालबत्ती धारक का रुतबा (पॉवर) अपने भीतर मर्दाना कमजोरी जैसा दौर्बल्य महसूस कर रहा है। उसे अपनी इस आम-हैसियतदारी पर सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा। उसके दिमाग के भीतर पैठ जमाए बैठी गाढ़े रंग की लालबत्ती उसे जब-तब झकझोर कर गहरी नींद में जगा दे रही है। उसे खास से आम बन जाने के लिए पल-प्रतिपल धिक्कारती-सी महसूस हो रही है। मगर क्या करें? मजबूरी है! साहेब का ठेठ अंदाज वाला आदेश जो ठहरा! हुक्म तो बजाना ही होगा!

मगर अब तो साहेब दिमाग के भीतर से भी लालबत्ती को हटाने की बात कर रहे हैं। यह हितग्राहियों के लिए दोहरे हादसे जैसा है। यह हादसा लालबत्ती तो अपना मन कड़ा कर जैसे-तैसे सह लेगी मगर लोकतंत्र के बिगड़े शहजादों का दिमाग इसे सहन करने की स्थिति में कतई नहीं है। उनका लती दिमाग बगैर लालबत्ती के हूटर के एक कदम भी आगे बढ़ने को राजी ही नहीं होगा। उनके लिए लालबत्ती एक नियमित नशे जैसी है। रुतबे की रगों में चौबीसों घंटे अनवरत दौड़ता-नाचता नशा! दरअसल, यह नशा उनके रसूख की बीमारी भी है, और उस बीमारी का मुख्य कारक भी। मगर अब हकीकत है कि इसके बगैर उन्हें जीना ही होगा और न जीने की तो कोई लोकतांत्रिक वजह भी नहीं है।

बहरहाल, लती दिमाग से लालबत्ती उतार कर ‘आम-हैसियतदारी’ की खूंटी पर टांगना इतना आसान काम भी नहीं है। बगैर दांत और नाखून के एक शेर जंगल में निरीहता के तमाशायी पात्र जैसा होता है। तभी तो शेर अपने वजूद को रौबदार दिखाने के लिए वैकल्पिक रास्ते भी तलाशने से नहीं चूकता। दरअसल, दिमाग की लालबत्ती राजतंत्र की एक रौबीली अदा होती है। इसके बगैर राजतंत्र बगैर नाखूनों के शेर जैसा निरीह प्राणी ही तो नजर आता है। और फिर एक पल के लिए मान भी लिया जाए कि गाड़ियों से उतरी लालबत्तियां उनके धारकों के दिमाग से भी कठोर अनुशासन के चलते उतरने-उतारने को मजबूर कर दी गई हैं तब भी लोकतंत्र में दशकों से नुमाया लाल-बत्तियों के नशीले जलवे को धारक की अमिट स्मृतियों से आखिर कैसे मिटाया जाएगा, यह देखना मजेदार होगा।
’राजेश सेन, अंबिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर

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