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चौपालः हाशिए पर किसान

मध्यप्रदेश में आंदोलनरत किसानों की पुलिसिया गोलीबारी में हुई मौत के बाद किसानों के मुद्दों पर सरकारें भी चिंतित दिखने का उपक्रम करने लगी हैं और आनन-फानन में उन्हें राहत पहुंचाने के कुछ कदम भी उठाए गए हैं। इनमें कर्जमाफी सबसे अहम है।

Author June 16, 2017 2:39 AM
मध्य प्रदेश के देवास जिले में राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन करते हुए किसानों ने ट्रेन रोकी। प्रशासन के खिलाफ किया विरोध प्रदर्शन। (PTI Photo)

मध्यप्रदेश में आंदोलनरत किसानों की पुलिसिया गोलीबारी में हुई मौत के बाद किसानों के मुद्दों पर सरकारें भी चिंतित दिखने का उपक्रम करने लगी हैं और आनन-फानन में उन्हें राहत पहुंचाने के कुछ कदम भी उठाए गए हैं। इनमें कर्जमाफी सबसे अहम है। लेकिन किसानों का आंदोलन सिर्फ कर्जमाफी के लिए नहीं था बल्कि इसके पीछे लंबे समय से सरकारों द्वारा उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिए जाने का गुस्सा भी था। नोटबंदी ने किसानों और व्यापारियों के बीच के विश्वास को तोड़ दिया है। जरूरत के समय बेची गई फसल की कीमत का भुगतान व्यापारियों ने नकद में न करके चेक से किया जो बैंकों में नगदी न होने के चलते महीनों तक केवल कागज का टुकड़ा बन कर रह गया। नोटबंदी से पैदा हुई समस्याओं के कारण जहां एक ओर फसल के सही दाम नहीं मिले वहीं दूसरी ओर लिए गए उधार का ब्याज प्रतिदिन बढ़ता गया। छोटे किसानों को गांव के साहूकारों से ही ब्याज पर रकम लेने पर मजबूर होना पड़ा जिसका ब्याज चुकाना अब उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

अर्थ, अर्थव्यवस्था और ई-बैंकिंग से अनजान इन गरीब किसानों के सामने अपने परिवार का भरण-पोषण करना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता है जिसके लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है और ये लोग ब्याज और मूल के चक्रव्यूह में उलझ जाते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के तीस फीसद ग्रामीण परिवारों पर औसतन एक लाख तीन हजार रुपए का कर्ज है। पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि अगर वह सत्ता ने आई तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करके यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना ज्यादा दाम मिले। लेकिन सत्ता में आते ही सरकार ने यह वायदा भुला दिया।

अगर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मान लिया जाता तो किसानों को आंदोलन करने पर मजबूर न होना पड़ता। किसानों की मांग को गैरजरूरी साबित करने के सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों से गुस्साए किसान अब कई राज्यों में आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं। किसानों की कर्जमाफी से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बोझ का रोना रोने वाले विशेषज्ञों के माथे पर तब एक शिकन भी दिखती जब कॉरपोरेट जगत का अरबों रुपए का कर्ज तुरंत माफ कर दिया जाता है। अब तो ‘बैड लोन’ के नाम पर बड़े कॉरपोरेट कर्जों की एकमुश्त माफी भी दी जा रही है।
मौजूदा सरकार के सभी नियम मध्य और उच्च वर्ग को केंद्र में रख कर बनाए जा रहे हैं जबकि सरकारों को नियम और कानून बनाने से पहले सभी वर्गों की आवश्यकताओं का ध्यान रखने की जरूरत है। भारत शुरू से ही कृषि-प्रधान देश के रूप में जाना जाता रहा है। कहीं ऐसा न हो कि गलत नीतियों के चलते अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे ये किसान हाशिये पर रह जाएं। इसका नुकसान हम सभी को होने वाला है।
’अश्वनी राघव, उत्तमनगर, नई दिल्ली

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