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चौपालः आजादी की सहिंता

मुस्लिम समाज के कुछ लोग संस्कृति की रक्षा के नाम पर अपने लिए अलग कानून चाहते हैं।
Author July 8, 2016 00:47 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

मुस्लिम समाज के कुछ लोग संस्कृति की रक्षा के नाम पर अपने लिए अलग कानून चाहते हैं। उनका मानना है कि बहुसंख्यक संस्कृति से अपनी अल्पसंख्यक संस्कृति की रक्षा तभी हो सकेगी जब राज्य विभेदीकृत कानून बनाए, सांस्कृतिक मामलों में हमें पूर्ण स्वतंत्रता दे। इसीलिए भारत में पर्सनल लॉ का सिद्धांत है। वैसे यह सिद्धांत दरअसल बहुसंस्कृतिवाद के नाम से जाता है। दूसरी ओर मांग यह है कि औरत और बच्चे पहले भारत के नागरिक हैं इसलिए उन्हें एक नागरिक के रूप में सारे अधिकार मिलेंगे। अब दिक्कत यह है कि पर्सनल लॉ समुदाय के अधिकार की बात करता है और पब्लिक लॉ व्यक्तिगत अधिकार की।

पर्सनल लॉ के साथ दिक्कत है कि इसे समुदाय बनाता है (तकरीबन हर देश की शरिया अलग है)। समुदाय के नाम पर समुदाय के धर्म के पंडित /ज्ञाता ही ये कानून बनाते हैं। ये धर्म के ज्ञाता कोई वैज्ञानिक/ कानूनविद तो होते नहीं हैं लिहाजा ये समाज में पहले से चल रही पितृसत्तातमक रूढ़ियों के हिसाब से ही कानून बनाएंगे। नतीजा यह होगा कि अल्पसंख्यक समाज रूढ़ियों से अधिक चिपका रहेगा और रूढ़ियों से चिपका हुआ समाज भावुक होता है इसलिए यह अपनी पहचान से चिपका रहेगा। स्त्रियों को उन अधिकारों को देने से बचेगा जो भारतीय नागरिक होने के नाते उन्हें मिलने चाहिए। इस प्रकार सरकार पर्सनल लॉ के जरिए अल्पसंख्यक आबादी के पचास फीसद हिस्से को समुदाय के रहमोकरम पर छोड़ देता है।

किसी भी देश को ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ मान कर चलना चाहिए। आपका कोई भी कानून अगर शोषण को बढ़ाता है तो वह ‘पर्सनल’ न होकर ‘पॉलिटिकल’ हो जाता है और सरकार उस पर कानून बना सकती है। समुदाय की आजादी व्यक्तिगत आजादी से बड़ी नहीं होनी चाहिए।
यहां साफ कर दूं कि मैं समान नागरिक संहिता के पूरी तरह समर्थन में नहीं हूं। जिन चीजों में अधिकार का खतरा न हो वे ‘पर्सनल’ ही होनी चाहिए जैसे शादी का तरीका, किससे शादी करनी है (मुस्लिम रिश्तों में शादी करते हैं) आदि।
’अब्दुल्ला मंसूर, जामिया, नई दिल्ली

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