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चौपालः कैसी आजादी

विश्वविद्यालयों में इन दिनों आजादी की फसल उगाई जा रही है! इस फसल को खाद और पानी देने का काम हमारे आदरणीय नेतागण कर रहे हैं।

Author March 4, 2017 3:07 AM
एबीवीपी के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्र। (Photo Source: REUTERS)

विश्वविद्यालयों में इन दिनों आजादी की फसल उगाई जा रही है! इस फसल को खाद और पानी देने का काम हमारे आदरणीय नेतागण कर रहे हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि भविष्य में इसके परिणाम क्या होंगे, उन्हें तो सिर्फ अपना सियासी फायदा दिखता है। तभी तो पिछले कुछ दिनों से आजाद भारत में आजादी की मांग करने वाले स्वर आम हो गए हैं और बड़ी आसानी से कहीं भी सुनने को मिल जाते हैं। आजादी के नारे लगाने वाले ये सारे लोग वही होते हैं जो महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने की बात कहते हैं और गुनगुनाते हैं- ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।’

कुछ वर्ष पहले तक आजादी के इनके नारे केवल कश्मीर में सुनने को मिलते थे मगर पिछले दिनों पहले ये स्वर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में गूंजे, उसके बाद हैदराबाद विश्वविद्यालय में यही मंजर देखने को मिला और फिर तो मुल्क के कई अन्य हिस्सों में भी यह सब दोहराया गया। इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में आजादी की यह जंग छिड़ी हुई है। घर से पढ़ाई के लिए निकले छात्र कॉलेज में आकर मार्च करते हैं, नारे लगाते हैं, वह भी आजादी के लिए। अब समझने वाली बात है कि गांधी के ये तथाकथित भक्त आखिर किस तरह की आजादी की बात करते हैं!

यह समझ से परे है कि जब सत्तर साल पहले साबरमती के संत ने खड्ग और ढाल के बिना आजादी दिला दी तो अब कैसी आजादी चाहिए? इस देश में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आप ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ तक के नारे लगा देते हैं, प्रधानमंत्री को गालियां तक दे देते हैं, फिर भी और आजादी चाहिए! आखिर आजादी है क्या? एक पाकिस्तान कम है जो कुछ लोगों को एक और पाकिस्तान चाहिए? या ये लोग कहीं इसलिए तो भ्रम में नहीं पड़ गए कि यहां स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है, आजादी दिवस नहीं! ये लोग शायद स्वतंत्रता और आजादी को अलग-अलग समझ बैठे हैं, इसीलिए भ्रम में आजादी मांग रहे हैं!
’सुकांत तिवारी, नई दिल्ली

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