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चौपालः खोखले वादे

किसानों की ऋण माफी के विषय में राज्य सरकारों के प्रयासों पर केंद्र सरकार के वित्तमंत्री को कहते सुना कि किसानों के ऋण माफी के लिए राज्य सरकारों को अपने स्तर पर संसाधन जुटाने होंगे।
Author June 24, 2017 03:16 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

किसानों की ऋण माफी के विषय में राज्य सरकारों के प्रयासों पर केंद्र सरकार के वित्तमंत्री को कहते सुना कि किसानों के ऋण माफी के लिए राज्य सरकारों को अपने स्तर पर संसाधन जुटाने होंगे। ऐसे में सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव प्रचार में किसानों की ऋण माफी के विषय में घोषणा करने से पहले क्या माननीय प्रधानमंत्री ने इस समस्या से जूझ रहे विभिन्न राज्यों के प्रादेशिक सरकारों से चर्चा की थी? क्या औद्योगिक घरानों की कर्ज माफी के समय जिन प्रदेशों के बैंकों ने उन्हें कर्ज दिया था, वहां के प्रादेशिक सरकारों से चर्चा की थी?

जब देश के प्रधानमंत्री के लिए देशवासियों की समस्याओं के समाधान के प्रयास से अधिक प्रादेशिक स्तर पर चुनावी रण जीतना महत्त्वपूर्ण हो जाए तो क्या यह सिद्ध नहीं होता की देश ने अपने नेतृत्व का दायित्व गलत हाथों को सौंपा है? शायद! माननीय प्रधानमंत्री के कुछ नजदीकी साथी भी यह मान और कह चुके हैं कि उनकी बातों का महत्त्व देश की जनता के लिए ‘जुमलों’ से अधिक नहीं। तभी चुनाव प्रचार में जो मन आया, बोल देते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो निश्चित रूप से चुनावी सभा में किसानों की ऋण माफी की घोषणा से पहले वे देश के उन सभी प्रदेशों के किसानों के विषय में भी सोचते जहां चुनाव तो नहीं थे, पर वहां के किसान और कृषि भी समस्याओं से घिरी है।

किसानों की कर्ज माफी कृषि की समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं। पर निश्चित रूप से समस्याओं से घिरे कृषि और कृषकों के लिए फौरी राहत तो जरूर थी। किसानों की इसी आवश्यकता का चुनावी लाभ उठाने के लिए संभवत: उन्होंने ऐसी घोषणा की थी। और अब जब चुनावी वादों को पूरा करने की बारी आई तो गेंद राज्य सरकारों के पाले में डाल रहे हैं, क्यों? पहले कहा था कि सरकार बनते ही सौ दिनों में विदेशों से काला धन लाएंगे और सभी के खातों में पंद्रह-पंद्रह लाख देंगे। यहां मोदी सरकार को सत्ता संभाले तीन साल से अधिक समय बीत गया, लेकिन क्या हुआ?

क्या शासकीय नीतियां और सहायता भी अब राजनीति की अवसरवादिता और सत्ता प्राप्ति की संभावना तय करेगी! अगर ऐसा है, तो क्या यह उदाहरण सिद्ध नहीं करता कि वर्तमान की व्यवस्था तंत्र के लिए राजनीतिक स्वार्थ का महत्त्व राष्ट्र के हित से अधिक है? अगर कहा है तो करना पड़ेगा और अगर नहीं कर सकते और ऐसे ही कह दिया था तो अब गलती मानते हुए पद से त्याग पात्र दें या परिणाम भुगतें। अपने खोखले शब्दों से देश के विश्वास, आवश्यकता और उम्मीद का उपहास करने की स्वतंत्रता क्या किसी राजनेता को केवल इसलिए दी जा सकती है कि आज उसे राष्ट्र के नेतृत्व का अधिकार प्राप्त है?
अगर राष्ट्र का नेतृत्व स्तरहीन है तो क्या परिस्थितियों को बदलने के लिए बेहतर यह नहीं होगा की व्यवस्था परिवर्तन के प्रक्रिया की शुरुआत राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व के परिवर्तन से की जाए? बात भारत की आतंरिक परिस्थितियों की करें या सामाजिक स्थिति की या देश के सीमावर्ती क्षेत्रों की, सभी तरफ तनाव है। लेकिन हमारे देश का नेतृत्व विदेश यात्राओं में व्यस्त है। इतना अवश्य है कि समय नई संभावनाओं की उम्मीद में है। लेकिन पता नहीं कि ये विकास’ कहां गायब होता जा रहा है!
’देवेंद्रराज सुथार, जेएनवीयू, जोधपुर

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  1. KAPILDEVSURISAGUN32@YAHOO.IN
    Jun 24, 2017 at 3:33 pm
    MEDIA इस BIASED अगेंस्ट थे ग्रोइंग पॉप्युलरित्यॉ modi एंड बीजेपी. मीडिया शुड तेल्ल व्हिच रेमिशन ऑफ़ फार्मर्स डेब्ट वेरे गिवेन बी कांग्रेस इन सिक्सटी इयर्स ऑफ़ थेइर CORRUPT मिस रूल ?
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