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चौपालः बाबाओं का जाल

कुछ लोग मजाक में ही सही, लेकिन अगर भारत को एक बाबा प्रधान देश कह रहे हैं तो शायद यह अतिश्योक्ति नहीं है!

Author September 23, 2017 02:44 am
फर्जी बाबा

कुछ लोग मजाक में ही सही, लेकिन अगर भारत को एक बाबा प्रधान देश कह रहे हैं तो शायद यह अतिश्योक्ति नहीं है! दरअसल, हाल में घटित फर्जी बाबाओं के जो काले कारनामे देखने को मिले, उससे निश्चित ही हमारी आस्था और विश्वास को गहरी चोट पहुंची है। क्या यह कम विडंबना का विषय है कि आज हमारे देश में जो सर्वेक्षण बेरोजगारों की गिनती करवाने के लिए होना चाहिए था, आज वह फर्जी बाबाओं की गिनती को लेकर किया जा रहा है। जब कोई व्यक्ति सरकारी धन का गबन करता है तो उसे अपराधी घोषित किया जाता है। तो क्या ये अलग-अलग धर्मों के बाबा और तथाकथित धर्मगुरु, जो देश के लोगों से करोड़ो की संपत्ति आस्था के नाम पर ठग या लूट रहे हैं, उन्हें भी यही दर्जा नहीं दिया जाना चााहिए? किसी सर्वेक्षण की एक खबर के मुताबिक विवादों के बाद तेईस प्रतिशत लोगों की आस्था बाबाओं से कम हुई है। पनचानबे प्रतिशत लोगों ने बाबाओं की संपत्ति की जांच की बात कही है और तीस प्रतिशत लोग बाबाओं के चत्मकार से अभी भी आकर्षित हैं।

एक ओर देश में बुलेट ट्रेन चलवाने के लिए सरकार की ओर से समझौते और प्रयास चल रहे हैं, दूसरी ओर फर्जी बाबाओं की ये खबरें आसमान से गिरा कर हमें खजूर में लटका देने जैसी हैं। क्या कारण है कि आज भी हमारे देश का पढ़ा-लिखा वैज्ञानिक भी कार में नींबू-मिर्ची लगा कर खुद को सुरक्षित मानता है? क्या कारण है कि आज कोई डॉक्टर भी बिल्ली के रास्ता काटने पर उलटे पांव मुड़ जाता है? कुकुरमुत्ते की भांति यत्र-अत्र-सर्वत्र उग आए ये तथाकथित बाबा कभी लाल और कभी हरी चटनियों में समस्याओं का निदान बताते हैं तो कभी गले में ताबीज और विभिन्न रंग के वस्त्र पहनने को समस्या का उपाय बताते हैं। विडंबना यह है कि इनके दरबार में लोगों की संख्या कम होने के बजाय दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। कई बाबाओं के तार सियासी दलों से जुड़े हुए हैं, जिनका भरपूर उपयोग राजनीति चमकाने के लिए नेता लोग करते हैं।

आज भारत के समक्ष विकसित राष्ट्र बनने की चुनौती है। ऐसे में हमें फर्जी बाबाओं के चंगुल से खुद को आजाद करवाना होगा। अपने भाग्य को इन बाबाओं के भरोसे न छोड़ कर अपने कर्म और खुद पर यकीन करना होगा। मेहनत से बढ़ कर किस्मत बदलने का कोई दूसरा औजार नहीं है। युवाओं को अपनी काबिलियत पर भरोसा करना चाहिए। मेहनत ही हाथों की लकीरें बदल सकती है। साथ ही मीडिया को यह समझना होगा कि फर्जी बाबाओं को टेलीविजन के स्क्रीन पर बैठा कर दर्शकों से अपनी समस्या को लेकर सीधे प्रसारण में सवाल पूछने जैसे कार्यक्रम तुरंत बंद किए जाएं। देश में सर्वव्यापी जागरूकता आंदोलन के लिए वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने की जरूरत है। आखिरकार हमें अपने ज्ञान को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखते हुए उसे व्यवहार में भी लाना होगा। हमारे बेहतर भविष्य के लिए हमारी दृष्टि वैज्ञानिक चेतना पर आधारित होगी, तभी वह सार्थक है।
’देवेन्द्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान

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