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चौपालः मुखौटे के पीछे

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के पीठ जिसमें जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता शामिल थे, ने विधवाओं के पुनर्वास के मामले में राज्यों के रवैये पर नाराजगी जाहिर की।

Author February 8, 2018 05:42 am
प्रतीकत्मक तस्वीर

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के पीठ जिसमें जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता शामिल थे, ने विधवाओं के पुनर्वास के मामले में राज्यों के रवैये पर नाराजगी जाहिर की। न्यायालय ने कहा कि अब बहुत हो गया, आपको इनके लिए कुछ करना ही होगा। इस मामले में पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि सामाजिक बंधनों की परवाह न करते हुए ऐसी विधवाओं के पुनर्वास से पहले पुनर्विवाह के बारे में योजना बनाए जिनकी उम्र कम है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि पुनर्विवाह भी विधवा कल्याणकारी योजना का हिस्सा होना चाहिए।

एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में विधवा महिलाओं की संख्या लगभग पांच करोड़ है जिनमें से अधिकतर जीवन यापन के लिए अपने परिवारों पर निर्भर हैं। आजकल के तेजी से बदलते समाज में जहां संयुक्त परिवारों का चलन कम हो रहा है वहां विधवा महिलाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अपनी कोई आमदनी और संपत्ति पर अधिकार न होने के चलते इन्हें जीने के लिए परिवार पर ही निर्भर रहना पड़ता है। गरीबी और बेरोजगारी, जहां एक ओर युवा वर्ग को अपने बुजुर्गों की देखभाल करने में अक्षम बना रही हैं वहीं दूसरी ओर बदलती सामाजिक मान्यताएं, पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद, एकल परिवारों का चलन, गांवों से पलायन और वैश्वीकरण जैसे कारक इन विधवाओं के जीवन को बदहाल बना रहे हैं। हाल ही में एक प्रोफेसर के अपनी बुजुर्ग मां को छत से नीचे फेंकने की घटना का वीडियो सोशल मीडिया में काफी चर्चित रहा जो हमारे समाज के असली चेहरे को उजागर करता है।

स्थिति तब और खराब हो जाती है जब कोई महिला छोटी आयु में पति को खो देती है। ऐसी महिला के दुख को हमारे समाज में व्याप्त कुरीतियां कई गुना बढ़ा देती हैं। महिलाओं की औसत आयु पुरुषों से अधिक होने के चलते कम उम्र विधवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है और साथ ही इनकी समस्याएं भी। पुनर्विवाह को आज भी हमारे समाज ने स्वीकृति नहीं दी है और सरकार भी इस विषय पर लोगों को जागरूक करने में नाकाम रही है। केवल कृष्ण-नगरी वृंदावन में ही करीब पचास हजार विधवा महिलाएं भीख मांगकर जीवन निर्वाह कर रही हैं। कुछ तो परिजनों द्वारा ठुकराने के कारण यहां पहुंचीं और जब कुछ को रोटी के लिए अपनों के ही आगे हाथ फैलाना पड़ा तो वे इस अपमान से बचने के लिए यहां आ गर्इं। यहां विधवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसीलिए वृंदावन को ‘विधवाओं का शहर’ भी कहा जाता है। एक सफेद धोती में अपना शरीर ढंकने का विफल प्रयास करती ये महिलाएं दस-बीस रुपये रोजाना में गुजर बसर कैसे कर पाती होंगी, इसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाले समाज के ठेकेदारों को इन महिलाओं की दयनीय स्थिति नजर नहीं आती। एक तरफ तो हमारा समाज नारी को पूजनीय मानने का ढिंढोरा पीटता है पर दूसरी ओर महिलाओं के साथ जानवरों जैसा बर्ताव करता है। दुख की बात है कि न तो सरकार और न ही समाज इस दिन-प्रतिदिन गंभीर होती समस्या के प्रति संवेदनशील नजर आ रहा है। विडंबना ही है कि जिस देश में जननी की स्थिति इतनी दयनीय है वहां लोग गाय और गोबर पर लड़ने में व्यस्त हैं। विकास के झूठे मुखौटे के पीछे समाज के भद््दे चेहरे को छुपाने की कोशिश हमें इन मानवीय मुद्दों के प्रति और संवेदनहीन बना रही है।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तम नगर, दिल्ली

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