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चौपालः किस ओर

आज के युग में कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा न दिखती हो। लोगों में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की अंधी होड़ लगी है।

Author November 18, 2017 2:30 AM
माता-पिता को केवल मेडिकल व इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित दिखता है। इसके साथ-साथ उनके मन में दिखावे की एक प्रवृत्ति सक्रिय रहती है।

आज के युग में कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा न दिखती हो। लोगों में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की अंधी होड़ लगी है। हाल के कुछ वर्षों में प्रतिस्पर्धा के इस युग ने लोगों को मशीन में बदल दिया है। प्रतिस्पर्धा व दिखावे के चक्कर में ही अभिभावक बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपते हैं बिना यह जाने कि बच्चे की रुचि किसमें है। माता-पिता को केवल मेडिकल व इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित दिखता है। इसके साथ-साथ उनके मन में दिखावे की एक प्रवृत्ति सक्रिय रहती है। यदि उनके पड़ोसी का बेटा किसी नामचीन स्कूल या कॉलेज में पढ़ता है तो वे भी अपने बच्चे को उसी स्कूल में या वैसे ही किसी प्रतिष्ठित स्कूल में भेजेंगे चाहे उनकी आर्थिक स्थिति ठीक न हो।

इस बदलते युग में लोगों की मानसिकता यह हो गई है कि महंगे प्राइवेट स्कूल में प्रवेश कर लेने से ही उनका बच्चा कामयाब हो जाएगा। लिहाजा, आज के बच्चे भी कठपुतली की तरह व्यवहार करने लगे हैं। छोटे-छोटे बच्चे गंभीर नजर आते हैं। खेलने-कूदने की उम्र में उनके कंधों पर भारी पाठ्यक्रम लदा होता है। अच्छे अंक लाने के लिए आजकल के छात्रों पर माता-पिता और अध्यापकों द्वारा इतना दबाव डाल दिया जाता है कि बच्चे लगातार अवसाद के शिकार होते जा रहे हैं। इसके चलते बच्चों का स्वाभाविक बौद्धिक विकास हो ही नहीं पा रहा है।

यदि बच्चे को शिक्षा संबंधी समस्या या कोई तनाव है तो उसे माता-पिता से ही तो साझा करेंगे। लेकिन आज के दौर में जब माता-पिता द्वारा ही बच्चे पर दबाव डाला जाएगा तो बच्चा कहां जाएगा? देश में युवाओं के आत्महत्या के मामलों में निरंतर वृद्धि यह बताती है कि वे कितने तनाव में हैं।
रेयान इंटरनेशनल स्कूल का मामला इसका एक ज्वलंत उदाहरण है जिसमें सीबीआइ के अनुसार ग्यारहवीं कक्षा के एक छात्र ने सात साल के प्रद्युम्न की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी कि इम्तिहान और अभिभावक-शिक्षक मीटिंग स्थगित हो सके। इसका कहीं न कहीं कारण यह है कि लोग भेड़चाल की भावना से ग्रस्त हैं। लोगों की यह मानसिकता हो गई है कि यदि अमुकजी के बेटे के 90 फीसद अंक आए हैं तो हमारे बेटे के भी उतने या उससे ज्यादा आने चाहिए। इसका खमियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। यह स्थिति हमें किस ओर ले जा रही है? यह हमारे समाज, बच्चों व शिक्षा व्यवस्था के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
’गुलअफ्शा, आंबेडकर कॉलेज, नई दिल्ली

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