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चौपालः विद्वेष के मंच

सोशल मीडिया के बारे में आज सबको बखूबी मालूम है। दरअसल, मौजूदा समय में इंटरनेट की दुनिया से वाकिफ हर व्यक्ति आज किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट से जुड़ा है।
Author December 8, 2017 02:52 am
(Source: Thinkstock Images)

सोशल मीडिया के बारे में आज सबको बखूबी मालूम है। दरअसल, मौजूदा समय में इंटरनेट की दुनिया से वाकिफ हर व्यक्ति आज किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट से जुड़ा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया के अनेक मंच आज अभिव्यक्ति का नया और कारगर माध्यम बन चुके हैं। इससे जुड़े लोग इसके माध्यम से अपनी राय जाहिर करते हैं। यहां तक कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां आमतौर पर हर मौके पर और चुनाव के समय भी अपनी हर तरह की राय प्रकट करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेती हैं।
लेकिन बढ़ते प्रयोग के साथ इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं। हालत यह है कि दो समुदायों के बीच अफवाह और नफरत फैलाने या दंगा कराने में सबसे ज्यादा इस समय सोशल मीडिया का ही दुरुपयोग किया जा रहा है। सच यह है कि आज कुछ लोगों का काम समाज में जहर घोलना ही रह गया है। सवाल है कि कौन हैं वे लोग जो आम जनमानस की खुशियों पर ग्रहण लगाने पर तुले हुए हैं। ऐसा लगता है कि कुछ राजनीतिक दलों ने भी अपने हितों को साधने के लिए सुबह-शाम सांप्रदायिकता फैलाने के मकसद से सोशल मीडिया का सहारा ले लिया है।

सोशल मीडिया पर अब रोजगार, महंगाई, विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम बुनियादी सुविधाओं पर होने वाली बातों को पीछे धकेल कर कभी पद्मावती के नाम पर तो कभी ताजमहल या टीपू सुल्तान के नाम पर लड़ाने वाले और अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले काफी लोग मिल जाएंगे। लेकिन ऐसा करने वालों को यह समझना होगा कि सदियों पहले जो काल के गाल में समा गए या जो सिर्फ कल्पना की उपज थे, उनके नाम पर बवाल मचाना कहीं हमारा वर्तमान और भविष्य न खराब कर दे। ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि जुम्मन मरे या जगदीश, हम दोनों स्थिति में हारेंगे। जीतेंगे सिर्फ वे जिनका मकसद नफरत की सियासत है। यह भी समझना होगा कि ऐसे लोगों के लिए गालियां, नफरत या दुश्मनी हथियार हैं, जो आम लोगों के हाथों में थमा दिए जाते हैं। जिन्हें मासूम लोग अपना रहनुमा समझते हैं, वे दरअसल उन्हें सिर्फ कंधे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

सही है कि सोशल मीडिया पर इस प्रकार की अभद्रता, अफवाह लिखने वाले कम लोग हैं। लेकिन बिना सच्चाई जाने अंगूठा लगा कर बेतुके संदेशों को आगे फैलाने वाले काफी लोग हैं। ये बातें काफी हैरान करने वाली हैं कि समाज का एक तबका किसी निरर्थक बात को मोबाइल पर टाइप करके आगे बढ़ाता है और उसी समाज का एक पढ़ा-लिखा हिस्सा उस कोरी अफवाह पर विश्वास करके एक आदमी को मारने दौड़ पड़ता है। सरकार को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जो संभव हो, वह करना चाहिए। ऐसा नहीं कि वह ऐसे कामों में लगे लोगों को संरक्षण देती दिखे।
’अपूर्व बाजपेयी, शाहजहांपुर

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