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चौपालः भटकाव की राजनीति

राजनीति एक जरिया है देश को सुव्यवस्थित और सुदृढ़ बनाने का, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से राजनीति गणित के लाभ-हानि के अध्याय की तरह की हो गई है।
Author December 7, 2017 02:46 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजनीति एक जरिया है देश को सुव्यवस्थित और सुदृढ़ बनाने का, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से राजनीति गणित के लाभ-हानि के अध्याय की तरह की हो गई है। आशय स्वार्थ-लोलुपता से है। धर्म अंत:करण की शुद्धता, प्रेम और समानुभूति का प्रतीक है। इस धर्मनिरपेक्ष देश में संकीर्ण मानसिकता लिए कुछ लोग धर्म की मूल भावना को खंडित करने का कोशिश कर रहे हैं। फूल-माला, चादर, मोमबत्ती, कट्टरता, भड़काऊ भाषण धर्म नहीं है। अगर किसी के चेहरे पर मुस्कान को सजाया जाए तो यह धर्म है। असहाय की मदद करना, प्यासे को पानी पिलाना, सड़क पर घायल को अस्पताल पहुंचाना, शोषण के स्थान पर सहयोग और परोपकार धर्म है। अब इस जात-पात को तोड़ना और छोड़ना होगा। जनता को संवेदनशील और जिम्मेदार होना होगा।

वर्तमान समय में राजनीति में धर्म का दखल जिस तरह बढ़ चुका है, वह किसी उल्का प्रहार से कम नहीं है। अनावश्यक धार्मिक मसलों को राजनीति में उड़ेलना एक प्रथा-सी बन गई है। मैं भी राजनीति के पक्ष और विपक्ष को आवश्यक मानता हूं, लेकिन बहस राष्ट्र निर्माण की होनी चाहिए, न कि हवा में की जाने वाली बयानबाजी। अंधाधुंध धार्मिक मामले राजनीति में जुड़ते जा रहे हैं जो रोज देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं। तमाम बुनियादी गंभीर विषयों पर बात करने का मौका नहीं मिल पा रहा है। घोषित सफलता के आंकड़ों का पुनरावलोकन करना होगा कि क्या सच में लक्षित को लाभ मिल पा रहा है या ये केवल कोरे सूचकांक हैं!

सुबह से धार्मिक मामलों का सिलसिला टेलीविजन पर चलता रहता है। कभी तेजोमहालय, मस्जिद विवाद, समाधि विवाद या राजनेताओं के विवादास्पद बयान तो कही हीरो-हीरोइन के आपसी तकरार! और भी ऐसे अनेक मुद्दे हैं जो हर वक्त टीवी चैनलों पर देखने को मिलते है। आखिर गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, महंगाई, ग्लोबल वार्मिंग, आंतकवाद, नक्सलवाद, बिजली का अभाव, खस्ताहाल सड़कें, पेंशन के लिए भागती-फिरती विधवा, असहाय वृद्धजनों का बैंको में चक्कर काटना, किसानों की आत्महत्या तो कहीं बेरोजगार युवाओं का धरना-प्रदर्शन। क्या यह सब वैसी गतिविधियां नहीं हैं, जो साथ में चल रही हैं और इन्हें मुख्यधारा में लाना चाहिए?

काफी गंभीर मामले हैं देश में जिनसे निबटना जरूरी है, न कि मंदिर और मस्जिद के मुद्दे में उलझना और सांप्रदायिकता फैलाना। धार्मिक मुद्दों के बजाय अगर जनता की जरूरतों की ओर ध्यान दिया जाए तो देश में पचास फीसद समस्याओं का निराकरण हो जाएगा। लेकिन आम नागरिक की समस्याओं की बात आते ही मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दे पर बात होने लगती है और विकास का सवाल हाशिये पर चला जाता है। कभी एक बार धर्म के बारे में उन वीर जवानों को पूछा जाना चाहिए जो ग्लेशियर में तैनात राष्ट्र सुरक्षा में लगे रहते हैं। वोट बैंक के लिए समुदायों को केंद्र बना कर की जाने वाली राजनीति देश की एकता और सौहार्द को तोड़ देगी।

राजनीति एक व्यवसाय नहीं, देश के चहुंमुखी विकास का पायदान है। हम कब तक इन धार्मिक मसलों और अंधविश्वासों में जीते रहेंगे? विश्व आगे बढ़ रहा है और हमें भी आगे बढ़ना है। क्यों तर्कहीन बातों में तर्क करके हम अपनी ऊर्जा बर्बाद करें? भारत विभिन्नताओं से भरा अद्भुत देश है। हम इन विभिन्नताओं को संवारें। यही असल ताकत है।
’रचित पंडया, जयपुर

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