ताज़ा खबर
 

चौपालः न्याय का तकाजा

इस बात पर किसी को कोई शक नहीं हो सकता कि देश के विकास में अपने श्रम से सबसे अधिक योगदान देने वाला तबका अनुसूचित जाति और जनजाति ही है।

Author April 4, 2018 3:11 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स इंडियन एक्सप्रेस के लिए ताशी)

इस बात पर किसी को कोई शक नहीं हो सकता कि देश के विकास में अपने श्रम से सबसे अधिक योगदान देने वाला तबका अनुसूचित जाति और जनजाति ही है। शक इस बात में भी नहीं है कि यही तबका सबसे ज्यादा अन्याय और भेदभाव का शिकार भी होता रहा है। लिहाजा संविधान बनाते समय बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने इनके हितों का पूरा ध्यान रखा और इनके हुकूक को बचाने वाले तमाम संवैधानिक उपचारों पर छोटे-मोटे विरोधों को छोड़ कर संविधान सभा में आमराय कायम रही। तब इनकी राजनीतिक उपस्थिति नगण्य थी लिहाजा, इस तबके का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए लोकसभा के भीतर करीब 120 ऐसी सीटों को सुरक्षित किया गया जहां से केवल इसी तबके के लोग चुने जा सकते थे। यह व्यवस्था आज भी कायम है। जिनका मत इससे पहले कोई पूछता तक नहीं था उन्हें सार्वभौमिक मताधिकार के दायरे में लाकर भारतीय लोकतंत्र ने अपनी शुरुआत में ही एक मिसाल पेश की। जबकि इससे पहले दुनिया का ऐसा कोई भी लोकतंत्र नहीं था जिसने अपने आरंभ में सबको समान राजनीतिक अधिकार दिए हों।

HOT DEALS
  • Micromax Vdeo 2 4G
    ₹ 4650 MRP ₹ 5499 -15%
    ₹465 Cashback
  • I Kall K3 Golden 4G Android Mobile Smartphone Free accessories
    ₹ 3999 MRP ₹ 5999 -33%
    ₹0 Cashback

राजनीतिक समस्याओं के दायरे में आ सकने वाली इस वर्ग की हर समस्या संविधान सभा में बैठ कर ही सुलझा ली गई थी। बाकी इसके बाद भी छुआछूत, समाज के स्तर पर जातिगत भेदभाव आदि जैसी अनेक सामाजिक समस्याओं का हल उस समय नहीं निकाला जा सका। क्योंकि सामाजिक समस्या का राजनीतिक समाधान हो भी नहीं सकता था और अगर होता तब बेढब और अलाभकारी ही होता। इन सामाजिक समस्याओं के मद्देनजर इस वर्ग के सबसे बड़े मसीहा डॉ आंबेडकर ने ‘शिक्षित बनो-संगठित रहो-संघर्ष करो’ का सूत्र दिया। पर हमने देखा कि इस सूत्र को हमारे बुद्धिजीवियों ने ठीक से नहीं पकड़ा। शिक्षित दलित शहर में आकर गांव में छूट गए अपने वर्ग के लोगों के उत्थान की योजना बनाने, उन्हें शिक्षित-संगठित करने की बजाय अपने साथ गांव में पहले हुए भेदभाव की गाथा कह कर बौद्धिक वर्ग की सहानुभूति लेने में मशगूल हो गया।

अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून के दुरुपयोग की पर्याप्त संभावना उसी में निहित थी। मुख्यधारा के समाज के लिए दलित और दूर हो गए। लोग उनसे बचने लगे क्योंकि उनके पास ऐसा अधिकार था जो किसी भी बात पर इस्तेमाल हो सकता था और आप बिना किसी सुनवाई के सलाखों के पीछे जा सकते थे। निर्दोष को सजा देने वाला कानून वैसे भी न्याय की अवधारणा के विरुद्ध था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उसमें उचित ही सुधार किया है। बिना किसी सियासी लाभ-लोभ के इसे स्वीकार करना चाहिए। एससी/एसटी एक्ट खत्म नहीं हुआ है बल्कि वह बदला है और विश्वसनीय भी हुआ है।

ऐसे में भारत बंद के दौरान जो हुआ वह निंदनीय है। सरकार को संवाद करना चाहिए। पद्मावती मामले में राजपूत करणी सेना के उपद्रव के आगे हाथ जोड़े रख कर सरकार ने एक खराब परंपरा पहले ही बना दी है। ऐसे में दलितों के प्रदर्शन पर हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि किसी भी तबके को तलवार लेकर सड़क पर उतरने और आतंक मचाने का हक कहीं न कहीं सरकार ही दे रही है। यह पूरी तरह से दलितों/वनवासियों से जुड़े एक फौजदारी कानून का मामला है। इसमें मुसलिम-दलित और पिछड़ा-अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति-जनजाति समीकरण की संभावना देखना, जो कुछ लोग देख भी रहे हैं, अवसरवाद है।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App