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चौपालः शुचिता का तकाजा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि कोई दोषी व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का पदाधिकारी कैसे हो सकता है और वह चुनावों के लिए उम्मीदवार का चयन कैसे कर सकता है?

Author February 22, 2018 4:31 AM
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि कोई दोषी व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का पदाधिकारी कैसे हो सकता है और वह चुनावों के लिए उम्मीदवार का चयन कैसे कर सकता है? एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा कि ऐसा होना चुनावों की शुचिता सुनिश्चित करने के उसके एक फैसले के विपरीत है। याचिका में दोषियों पर राजनीतिक दल बनाने और उसमें पदाधिकारी बनने से तब तक रोक लगाने का अनुरोध था जब तक वे चुनाव संबंधी कानून के तहत अयोग्य हैं। अदालत ने इस पर केंद्र सरकार से दो हफ्ते में जवाब देने को कहा है।

सरकार क्या जवाब देती है यह तो वक्त बताएगा लेकिन याचिका में किया गया अनुरोध कई मायनों में अहम है। दरअसल, किसी भी लोकतंत्र का भविष्य उसके जनप्रतिनिधियों के आचरण पर निर्भर करता है। भारत के समग्र विकास के लिए भी यह अत्यंत आवश्यक है कि संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग चुनकर जाएं जो दागदार न हों और राष्ट्र-निष्ठा में दक्ष हों। ऐसा तभी होगा जब चुनाव के लिए सिर्फ साफ छवि के ईमानदार लोगों को ही टिकट मिले। लेकिन आज देश में कुछ राजनीतिक दलों के शीर्ष पर ऐसे नेता बैठे हैं, जो खुद तो जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हैं लेकिन चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन करते हैं। ऐसे नेताओं से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे योग्य उम्मीदवारों को टिकट देंगे?

भ्रष्ट नेताओं के बारे में चाणक्य ने कहा था- पिशुन: नेता पुत्र दारै अपि त्यज्यते। अथार्त भ्रष्ट, चाटुकार, नीच या कायर नेता का त्याग उसकी पत्नी और बच्चे भी कर देते हैं। यदि हमें भी अपने लोकतंत्र को मजबूत करना है और देश को तेजी से आगे बढ़ना है तो भ्रष्ट और अयोग्य नेताओं का जल्द से जल्द त्याग कर देना चाहिए।
’राहुल रंजन, आईआईएमसी, दिल्ली

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