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चौपालः खतरे की घंटी

हरियाणा के यमुना नगर में एक स्कूल में बारहवीं कक्षा के छात्र ने अपनी प्रिंसिपल की गोली मारकर हत्या कर दी।

Author January 24, 2018 02:41 am
हरियाणा के यमुना नगर में एक स्कूल में बारहवीं कक्षा के छात्र ने अपनी प्रिंसिपल की गोली मारकर हत्या कर दी।

हरियाणा के यमुना नगर में एक स्कूल में बारहवीं कक्षा के छात्र ने अपनी प्रिंसिपल की गोली मारकर हत्या कर दी। इस छात्र को हाल ही में हाजिरी कम होने पर स्कूल से निलंबित कर दिया था और शिक्षकों की शिकायत करने पर प्रिंसिपल ने उसे सबके सामने डांटा था, जिससे वह नाराज था। उसने अपने घर से पिता की रिवाल्वर निकाली, स्कूल आया और प्रिंसिपल के कमरे में जाकर उन्हें गोली मार दी।

अभी पिछले हफ्ते ही लखनऊ के ब्राइट लैंड स्कूल में एक छात्रा ने पहली कक्षा के छात्र को शौचालय में जाकर इसलिए चाकू मार दिया कि वह स्कूल में छुट्टी कराना चाहती थी। गनीमत रही कि घायल छात्र को किसी ने देख लिया और उसकी जान बच गई। पिछले साल सितंबर में गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में प्रद्मुम्न की हत्या भी एक बड़े बच्चे ने की थी, ताकि वह परीक्षा से बच सके। बीते दिनों ग्रेटर नोएडा में भी एक छात्र ने अपनी मां और बहन की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसे पढ़ाई के लिए टोका जाना पसंद नहीं था। इन घटनाओं से एक बार फिर संवेदनशील समाज चिंता में है कि आखिर हमारे बच्चों को क्या होता जा रहा है। आज हम बच्चों को शिक्षित करने पर जोर दे रहे हैं लेकिन उन्हें क्या शिक्षा मिल रही है, इसका उनके जीवन में क्या लाभ हो रहा है, इस पर गौर करना होगा।

आखिर हम अपने बच्चों को सभ्य नागरिक और बेहतर इंसान बनाने के लिए स्कूल भेजते हैं या अपराधी बनाने के लिए? बच्चा नर्सरी और पहली कक्षा में जाता है तो मां-बाप, शिक्षक, समाज उसके अबोध मन में ‘तुम्हें कक्षा में सबसे आगे रहना है’, ‘तुम्हें प्रथम आना है’ जैसे विचार भर देते हैं। बालक को प्रतियोगिता, जलन, ईर्ष्या की शिक्षा हम नर्सरी और पहली कक्षा से देना शुरू कर देते हैं। अच्छे अंक आएं तो उपहारों से नवाजा जाता है और खराब अंक आए तो सबके सामने डांट पड़ती है। दूसरों के बच्चों से तुलना करना तो जैसे मां-बाप का परम कर्तव्य है। अब एक कक्षा में पचास छात्र हैं तो उनमें से एक ही प्रथम आएगा, बाकि उनचास छात्र तो प्रथम नहीं आ सकते!

हम सोचते ही नहीं कि बच्चे छोटे हैं तो क्या हुआ, आत्मसम्मान उनका भी है। लेकिन अभी तो हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो चुकी है कि बच्चे साल भर परीक्षा देते रहते हैं। ग्रीष्मकालीन, शीतकालीन अवकाश के नाम पर जो गिनी-चुनी छुट्टियां मिलती हैं, उनमें ढेर सारा होमवर्क और प्रोजेक्ट पूरा करने में जुटे रहते हैं। मां-बाप भी खुश रहते हैं कि चलो, महंगे स्कूल में बच्चे को पढ़ा रहे हैं तो लागत पूरी वसूल होनी चाहिए, भले इससे बच्चे में कुंठाएं पनपें, उन्हें इससे मतलब नहीं। स्कूलों में खेल के मैदान सिमटते जा रहे हैं और रिहायशी इलाकों में भी बच्चों को खेलने के लिए जगह नहीं मिलती। इस आयु में ऊर्जा को जबरन दबाया जाएगा तो वह गलत तरीकों से ही बाहर आएगी। बच्चों के हाथों में मोबाइल और गाड़ी देकर हम समझते हैं कि मां-बाप होने का एक और फर्ज अदा कर दिया। लेकिन उनके मन की बात सुनने के लिए कितना वक्त हमने निकाला, यह भी सोचना चाहिए। बच्चों की भावनाओं को न समझ पाने के दुष्परिणाम एक के बाद एक भयावह घटनाओं के रूप में सामने आ रहे हैं। यह समाज के लिए खतरे की घंटी है।
’कुशाग्र वालुस्कर, भोपाल, मध्यप्रदेश

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