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चौपालः बचपन का मजहब

किसी भी बच्चे का मन निर्मल और पूर्वाग्रह-रहित होता है। वह धर्म का अर्थ नहीं जानता।

Author December 30, 2017 3:50 AM
धार्मिक क्रियाकलापों की छाप बाल-मन पर अपने आप पड़ने लगती है। फिर भी लगभग सभी प्रबुद्ध माता-पिता अपने बच्चों को खुद नहीं बताते हैं कि हमारा धर्म क्या है।

किसी भी बच्चे का मन निर्मल और पूर्वाग्रह-रहित होता है। वह धर्म का अर्थ नहीं जानता। अपने घर में और आसपास होने वाले धार्मिक क्रियाकलापों की छाप बाल-मन पर अपने आप पड़ने लगती है। फिर भी लगभग सभी प्रबुद्ध माता-पिता अपने बच्चों को खुद नहीं बताते हैं कि हमारा धर्म क्या है। बालक किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से अलग करके नहीं देखता है। वह समझता है कि सभी धार्मिक त्योहार सब लोग मना सकते हैं। इसका आंख खोल देने वाला एक उदाहरण हमने देखा। एक बच्चे ने अपनी मां से पूछा- ‘कल ईद है न?’ मां ने कहा- ‘हां।’ तब बच्चे ने कहा- ‘कल हम मस्जिद चलेंगे?’ इस पर मां चुप रह गई। जाहिर है, मस्जिद जाने वालों का धर्म और बालक का धर्म अलग-अलग था। इस तरह का कोई अनुभव माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी को भी अवश्य हुआ होगा।

देखा गया है कि आमतौर पर बच्चों का धर्म-विशेष से प्रथम परिचय स्कूल से ही शुरू होता है जब स्कूल की पुस्तकों के किसी पाठ में पहली बार अलग-अलग धर्मों की जानकारी दी गई होती है। ऐसी परिचयात्मक जानकारी देना ठीक ही है, पर प्रश्न यह है कि यह जानकारी कब दी जाए! हमारे उपर्युक्त अनुभव से यही प्रतीत होता है कि बाल-मन की निर्मलता को यथासंभव, धार्मिक पूर्वग्रहों से दूर रखा जाना चाहिए। इस विचार से शायद ही कोई असहमत हो। इसलिए विभिन्न धर्मों से परिचित कराने वाले पाठों को प्राथमिक शिक्षा के बाद या उसके अंतिम चरण में ही दिया जाना उचित होगा।

कभी-कभी बच्चे स्कूल से घर वापस आकर माता-पिता से पूछने लगते हैं कि हम कौन हैं। तब उन्हें पता चलता है कि उनका धर्म क्या है, चाहे अभी वे इसका अर्थ न भी समझते हों। फिर भी बच्चे का मन निर्मल और पूर्वग्रह-रहित ही रहता है। बाल-मन को धार्मिक पूर्वग्रहों से दूर रखने में हमारे परिवारों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इसका एक उपाय यह हो सकता है कि माता-पिता सभी धर्मों के विशेष त्योहारों के अवसर पर अपने बच्चों को विभिन्न धर्म-स्थानों में लेकर जाएं। इस तरह के प्रयास का भावी पीढ़ी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है। बड़ा होकर बच्चे कैसे बनेंगे- यह कोई नहीं जानता है। कम से कम बाल-मन को तो धार्मिक पूर्वग्रहों और धार्मिक संकीर्णताओं से दूर रखने का प्रयास किया ही जा सकता है। इसमें परिवार और समाज भी अपना योगदान कर सकते हैं।
’हेमचंद्र पांडे, हौज खास, नई दिल्ली

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