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चौपाल: अतार्किक विरोध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकौड़े बेचने को रोजगार से क्या जोड़ा कि विरोधियों ने उनकी लानत-मलामत में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कांग्रेस नेता पी चिदंबरम तो इस क्रम में भीख मांगने को भी रोजगार कह बैठे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (स्क्रीनशॉट/यूट्यूब)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकौड़े बेचने को रोजगार से क्या जोड़ा कि विरोधियों ने उनकी लानत-मलामत में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कांग्रेस नेता पी चिदंबरम तो इस क्रम में भीख मांगने को भी रोजगार कह बैठे। विपक्ष में होने के नाते उनसे अपनी विरोधी पार्टी के प्रधानमंत्री के बयानों का विरोध अपेक्षित है और स्वीकार्य भी। लेकिन देश के पूर्व वित्तमंत्री होने के नाते उनका विरोध तर्कयुक्त और युक्तिसंगत हो, इसकी भी अपेक्षा है। यह तो असंभव है कि वे रोजगार और भीख मांगने के अंतर को न समझते हों, लेकिन फिर भी ऐसे स्तरहीन तर्कों से विरोध केवल राजनीति के गिरते स्तर को ही दर्शाता है।

चिदंबरम ही नहीं, देश के अनेक नौजवानों ने पकौड़ों के ठेले लगाकर प्रधानमंत्री के इस बयान का विरोध किया। हार्दिक पटेल ने तो सभी हदें पार करते हुए यहां तक कह डाला कि ऐसी सलाह एक चाय वाला ही दे सकता है! वैसे ‘आरक्षण की भीख’ के अधिकार के लिए लड़ने वाले एक 24 साल के इस नौजवान से भी शायद इससे बेहतर प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं थी! दरअसल, जो लोग इस प्रकार की बयानबाजी कर रहे हैं वे भूल रहे हैं कि स्वाभिमान से अपनी जीविका कमाना इस धरती के हर मानव का अधिकार ही नहीं है, बल्कि यह उसका अपने और अपने परिवार के प्रति दायित्व भी है। माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष एवं पर्सनल कंप्यूटर क्रांति के अग्रिम उद्यमी बिल गेट्स का कथन ‘गरीब पैदा होना आपकी गलती नहीं है लेकिन गरीब मरना आपका अपराध है’ इन बयानबाजों के समझने के लिए अपने भीतर काफी कुछ समेटे है।

यह सही है कि हमारे देश में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है लेकिन पूरे विश्व में केवल हमारे देश में बेरोजगारी की समस्या हो, ऐसा नहीं है। सबसे मूल प्रश्न यह है कि स्वामी विवेकानंद के इस देश का नौजवान आज आत्मनिर्भर होने के लिए सरकार पर इतना निर्भर क्यों है? वे युवा, जो अपना ही नहीं, बल्कि देश का भविष्य भी बदल सकते हैं, आज अपनी क्षमताओं, योग्यता, स्वाभिमान और शक्ति सभी कुछ ताक पर रखकर चपरासी तक की सरकारी नौकरी के लिए लाखों की संख्या में आवेदन क्यों करते हैं? जिस देश में जाति व्यवस्था आज भी केवल एक राजनीतिक हथियार नहीं बल्कि समाज में ऊंच-नीच का आधार है, वहां जाति के आधार पर आरक्षण की मांग क्यों की जाती है?

असल में कुछ लोगों को बिना काम, बिना मेहनत के सरकारी तनख्वाह चाहिए। इसलिए प्रधानमंत्री का यह बयान उन्हीं लोगों को बुरा लगा जो बेरोजगार बैठ कर सरकार और अपने नसीब को तो कोस सकते हैं, जाति और धर्म का कार्ड खेल सकते हैं मगर कर्म से अपना और अपने देश का नसीब बदलने में यकीन नहीं रखते। ये केवल सरकार को कोसने में समय बरबाद कर सकते हैं। शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी अपने शुरुआती दिनों में सप्ताहांत में गिरनार की पहाड़ियों पर तीर्थ यात्रियों को पकौड़े बेचा करते थे! स्वयं गांधीजी कहते थे कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, सोच होती है। आज जरूरत देश के नौजवानों को अपनी सोच बदलने की है। समय इंतजार करने का नहीं, उठ खड़े होने का है। एक दिन में कोई टाटा-बिड़ला नहीं बनता और न बिना संघर्ष के कोई अडानी या अंबानी बनता है। तो आवश्यकता है देश के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री की बात समझने की, न कि तर्कहीन बातें करने की।

नीलम महेंद्र, लश्कर, ग्वालियर

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