ताज़ा खबर
 

चौपालः जीवन की परीक्षा

प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में छात्रों से ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हुए कहा था कि मार्क्स जिंदगी नहीं होते और न ही किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमत्ता का पैमाना महज अंकों का प्रतिशत होता है।

Author March 10, 2018 2:37 AM
(फोटो-पीटाई)

प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में छात्रों से ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हुए कहा था कि मार्क्स जिंदगी नहीं होते और न ही किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमत्ता का पैमाना महज अंकों का प्रतिशत होता है। हर बच्चे के पास अपनी विशिष्ट प्रतिभा होती है और उन्हें जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपने भीतर छिपी क्षमताओं को जगाना चाहिए। प्रधानमंत्री की इन बातों का महत्त्व इसलिए ज्यादा है कि बोर्ड परीक्षाओं में 95 से 100 प्रतिशत अंक हासिल करने की अंधी दौड़ मची है और 95 प्रतिशत से कम अंक पाने वाले छात्र औसत कहलाने लगे हैं। कई बार विद्यार्थी परीक्षा में अपनी उम्मीदों से कुछ कम अंक आने पर निराश तथा हताश हो जाते हैं और अपनी जिंदगी को ही दांव पर लगा देते हैं। दुर्भाग्य से हमारे देश में जोर केवल मार्कशीट में छपे नंबरों पर है न कि ज्ञान अर्जित करने पर। मानसिकता यह है कि केवल अच्छे नंबर लाने वाले सफल हैं जबकि वास्तविकता में ज्ञान का नंबरों से कोई खास लेना-देना नहीं होता है। सबसे अव्वल दर्जे के अंक के आधार पर इस बात की कतई गारंटी नहीं दी जा सकती कि इन अंकों के साथ उत्तीर्ण छात्र व्यावहारिकता में भी उतना ही योग्य भी होगा! लेकिन लगता है, आज शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस नंबर-दौड़ में कहीं गुम होकर रह गया है।

HOT DEALS
  • I Kall Black 4G K3 with Waterproof Bluetooth Speaker 8GB
    ₹ 4099 MRP ₹ 5999 -32%
    ₹0 Cashback
  • Coolpad Cool C1 C103 64 GB (Gold)
    ₹ 11290 MRP ₹ 15999 -29%
    ₹1129 Cashback

देशभर से हर दिन किसी न किसी छात्र के आत्महत्या की खबर आती रहती है, तो दिमाग में सवाल कौंधता है कि स्कूलों और कॉलेजों में क्यों इस बात को लेकर क्लास नहीं होती कि बोर्ड तथा प्रतियोगी परीक्षाएं ही जीवन की वास्तविक परीक्षा नहीं होतीं? हमारे देश के स्कूलों में छात्रों को डॉक्टर, इंजीनियर या आइएएस अफसर बनने के लिए तो खूब प्रेरित किया जाता है लेकिन जीवन के संघर्षों के प्रति संवेदनशील, एक मजबूत, सुदृढ़ इंसान बनने के लिए न के बराबर प्रेरित किया जाता है। ऐसे में पढ़ने-पढ़ाने की पूरी प्रक्रिया और उसके बाद के नतीजों को बच्चों के नजरिए से तौलने-परखने का वक्त आ गया है।

बढ़ते तनाव को कम करने के लिए स्कूलों में भी समय-समय पर बच्चों की काउंसलिंग होनी चाहिए ताकि वे मानसिक रूप से धैर्यवान, सबल और इस हद तक मजबूत बन सकेंकि जीवन की संभावित कठिनाइयों, परेशानियों के समक्ष सहज रह सकें। ये परेशानियां उनकी जिजीविषा को जरा भी प्रभावित न कर सकें। साथ ही, हरियाणा सरकार की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर बस्ते के बोझ तथा पाठ्यक्रम की अधिकता का गैर-जरूरी दबाव कम किया जाना चाहिए। अभिभावकों को भी चाहिए कि नंबर गेम के बजाय बच्चे की प्रतिभा को समझें और उसे अपनी रुचि के अनुरूप पढ़ने और कैरियर का चुनाव करने की आजादी दें। इसके अलावा शिक्षा बोर्डों और स्कूलों को बच्चों को नंबर देने के बजाय ग्रेडिंग सिस्टम को तरजीह देनी चाहिए।
’कैलाश मांजू बिश्नोई, जोधपुर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App