Opinion about PM Modi statement that 20 best universities to get Rs 10,000 cr, autonomy, - Jansatta
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चौपालः गुणवत्ता की शिक्षा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार बीस विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए दस हजार करोड़ रुपए खर्च करेगी, इन विश्वविद्यालयों का चयन मेधा व क्षमता पर प्रतिस्पर्धा के जरिए होगा।

Author October 30, 2017 2:15 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार बीस विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए दस हजार करोड़ रुपए खर्च करेगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार बीस विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए दस हजार करोड़ रुपए खर्च करेगी, इन विश्वविद्यालयों का चयन मेधा व क्षमता पर प्रतिस्पर्धा के जरिए होगा। यह कदम स्वागतयोग्य इसलिए है कि कोई भी देश ज्ञान की महाशक्ति बने बगैर आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना सच नहीं कर सकता। उच्च शिक्षा में सुधार के लिए सरकार को इसी तरह के बहुत से ठोस कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के शोध के मुताबिक देश के 90 फीसद कॉलेजों और 70 फीसद विश्वविद्यालयों के पठन-पाठन का स्तर बहुत निम्न है।

इसका मुख्य कारण विश्वविद्यालयों में आधारभूत संसाधनों का अभाव तथा हजारों की संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त होना है। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 40 फीसद और कई राज्यों के विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों के 50 फीसद से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद तथा राजनीतिक पक्षपात ज्यादा होता है इसलिए प्राध्यापकों की पारदर्शी नियुक्ति के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर ‘अखिल भारतीय शिक्षा सेवा’ की स्थापना की जानी चाहिए।

भारत में हर साल लगभग 40 लाख युवा स्नातक होते हैं, मगर ज्यादातर को ऐसा कोई कौशल नहीं सिखाया जाता जिससे वे किसी उद्योग या व्यवसाय में नौकरी पा सकें अथवा अपना व्यवसाय खुेद शुरू कर सकें। नैसकॉम और मैकिन्से की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मानविकी के दस फीसद तथा इंजीनियरिंग के 25 फीसद छात्र ही नौकरी पाने की जरूरी काबिलियत रखते हैं।

ऐसे में भारत को अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार की मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाले कौशल की शिक्षा देना भी जरूरी है। इसके लिए उद्योगों से मिले फीडबैक पर आधारित कौशल विकास पाठ्यक्रम तैयार करने चाहिए जो समय-समय पर नवीनतम तकनीक के अनुसार अद्यतन होते रहें।
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों पर गैर-अकादमिक कार्यों का बोझ कम करने की भई जरूरत है। साथ ही सभी विश्वविद्यालयों में एक तय सीमा के बाद पाठ्यक्रम में बदलाव होते रहना चाहिए क्योंकि उच्च शिक्षा के तीन मुख्य निर्धारित उद्देश्य हैं- शिक्षण, शोध एवं विस्तार कार्य। इन उद्देश्यों को पाने का माध्यम पाठ्यक्रम ही होता है।

भारत में अगर उच्च शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाना है तो सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि उन्नीसवीं सदी में विचरण करती भारत की स्कूली शिक्षा को 21 वीं सदी के मानकों के अनुरूप ढाला जाए। अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों को भी आइआइएम की तरह अधिक स्वायत्तता दी जाए। साथ ही इन्हें यूजीसी जैसे नियामकों के अनावश्यक हस्तक्षेप से भी बचाया जाए। आज देश के कई विश्वविद्यालय राजनीति के अखाड़े बनते जा रहे हैं। इन परिसरों को राजनीति और सत्ता से दूर रख क र अकादमिक रुझान पैदा करने की आवश्यकता है। तभी भारत ज्ञान की महाशक्ति बनने के साथ-सा वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना भी पूरा कर सकेगा।
’कैलाश मांजू बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली

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