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चौपालः मर्यादा के विरुद्ध

लगातार हंगामे की भेंट चढ़ी पंद्रहवीं लोकसभा के बाद जनता को उम्मीद थी कि सोलहवीं लोकसभा में हालात सुधरेंगे, मगर स्थिति दिन पर दिन बद से बदतर होती चली जा रही है।

Author March 14, 2018 2:42 AM
हर रोज संसद की मर्यादा को सदस्यों द्वारा ही तार-तार किया जाता है।

लगातार हंगामे की भेंट चढ़ी पंद्रहवीं लोकसभा के बाद जनता को उम्मीद थी कि सोलहवीं लोकसभा में हालात सुधरेंगे, मगर स्थिति दिन पर दिन बद से बदतर होती चली जा रही है। पूरे देश की नजर संसद पर टिकी होती है। जनता उम्मीद करती है कि हमारे द्वारा चुन कर संसद में भेजे गए प्रतिनिधि हमारे हित में सकारात्मक निर्णय लेंगे मगर वास्तविकता इसके उलट है। हर रोज संसद की मर्यादा को सदस्यों द्वारा ही तार-तार किया जाता है। पिछले लंबे समय से सदस्यों के बीच तीखी बहस होना, विवादित बयान दिया जाना, संसद की कार्यवाही में बाधा डालना, कागज के गोले फेंकना, लोकसभा अध्यक्ष के आदेश की अवमानना करना आदि आम हो गया है। यह सच है कि आज के समय में नेताओं के दिमाग में एक बात घर कर गई है कि हंगामा करके और विवादित बयान देकर ही मीडिया में आया जा सकता है और जनता के बीच ख्याति प्राप्त की जा सकती है। मगर वे शायद इस बात से अनजान हैं कि उनके इस प्रकार के कृत्य देश की जनता के दिलो-दिमाग में उनकी नकारात्मक छवि बना रहे हैं।

संसद में इसी प्रकार के हंगामे को लेकर पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने एक बार सदन में खड़े होकर कहा था कि जितने सदस्य सदन में हंगामा करते हैं, उन्हें पूरा देश देख रहा है और मैं उम्मीद करता हूं कि आगामी चुनाव में जनता द्वारा उनको नकार दिया जाएगा और उनकी हार होगी। इस तरह की घटनाओं से हम समझ सकते हैं कि आम जनता की नजर में सांसदों की छवि दिन पर दिन खराब होती जा रही है। आंकड़ों के अनुसार संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट लगभग 2.5 लाख रुपए खर्च होते हैं। इस हिसाब से सोमवार से शुक्रवार तक की कार्यवाही पर 115 करोड़ रुपए खर्च हो जाते हैं।

माननीय सांसद शायद भूल रहे हैं कि जिस सदन में वे बैठे हुए हैं उसकी कार्यवाही में खर्च हो रहा एक-एक पैसा जनता द्वारा दिन-रात जी तोड़ मेहनत करने के बाद कमाया हुआ पैसा है जो करों के रूप में सरकारी कोष में जमा होता है। सरकार को संसद की छवि सुधारने के लिए विशेष नियम या कानून बनाने के साथ उन्हें अमल में लाने की जरूरत है, जिससे संसद को फिर से सशक्त बनाया जा सके।
’राजेश्वर सिंह, एएमयू, अलीगढ़

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