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चौपालः द्वेष के बीज

वैसे तो पिछला साल कई खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने भीतर समेटे रहा पर जो छाप उसके दौरान मीडिया के राजनीतिकरण, फर्जी खबरों और ट्रॉलिंग ने जनमानस पर छोड़ी है उसका असर भविष्य में भी दिखना निश्चित है।

Author January 4, 2018 3:07 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

वैसे तो पिछला साल कई खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने भीतर समेटे रहा पर जो छाप उसके दौरान मीडिया के राजनीतिकरण, फर्जी खबरों और ट्रॉलिंग ने जनमानस पर छोड़ी है उसका असर भविष्य में भी दिखना निश्चित है। राजनीतिक स्वार्थ के चलते सोची-समझी रणनीति के तहत किए गए मीडिया के प्रयोग से जहां इसकी विश्वनीयता पर सवाल खड़ा हो गया है वहीं जन सरोकारों से जुड़े बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और संविदाकर्मियों के शोषण संबंधी महत्त्वपूर्ण मुद्दे बहस से बाहर हो गए। इसका सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को हुआ है।
फर्जी समाचारों का सबसे जीता-जागता उदाहरण एक प्रमुख समाचार चैनल द्वारा चलाया गया वह वीडियो था जिसमें नोटबंदी के बाद जारी किए गए दो हजार के नए नोटों के जीपीएस चिप से लैस होने के बारे में विस्तार से बताया गया था। इस वीडियो में दिए गए ब्योरे इतने मूर्खतापूर्ण थे कि इसे पहली नजर में ही जानबूझ कर की गई भरमाने वाली रिपोर्टिंग कहा जा सकता था। सोशल मीडिया में भी पूरे साल फर्जी खबरें छाई रहीं। इन्हीं खबरों के चलते जमशेदपुर में उन्मादी भीड़ ने पुलिस के सामने ही सात निर्दोष लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। खून से सने पीड़ित और उनके परिवार वाले जान बख्शने की भीख मांगते रहे पर किसी का दिल नहीं पसीजा। चाहे सहारनपुर हिंसा हो, दादरी कांड हो या पहलू खान की हत्या, इस उन्मादी भीड़ के आगे किसी की नहीं चली।

फर्जी और भड़काऊ खबरें, जो कि सिर्फ वोट का ध्रुवीकरण कर चुनावी लाभ उठाने के लिए चलाई जाती हैं, हमारे समाज में हिंसा और नफरत का जहर घोल रही हैं। हमारे युवा उन्मादी भीड़ में तब्दील हो रहे हैं। उनके पास समस्याओं पर निष्पक्षता से विचार करने या किसी से सवाल पूछने का समय नहीं है। उन्हें बस हिंसा करने की जल्दी है क्योंकि उनके मस्तिष्क में ऐसे ही विचारों का रोपण किया जा रहा है। चौबीस घंटे सोशल मीडिया पर वे देशद्रोही, दलाल, बदला, सिर के बदले सिर, गद्दार शब्द देखते और पढ़ते हैं जो उनके चारों तरफ एक ऐसा आवरण बना देते हैं जिसमें सिर्फ हिंसा, पत्थरबाजी, गाली-गलौज के लिए जगह है। उसे कभी किसी को देशद्रोही कहने की जल्दी है, कभी विपरीत विचारधाराओं की महिलाओं को वेश्या कहने की जल्दी है तो कभी दूसरों को दोषी साबित करने की जल्दी है। सबको न्याय स्वयं करना है दूसरे का पक्ष सुने बिना!

आज के भारत में, जहां शांतिपूर्ण बहस और विमर्श में यकीन करने वाले किसी ज्ञानवान व्यक्ति को धमकियों, ट्रॉलिंग और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, हम लोगों की चेतना में इस रास्ते से किसी किस्म की क्रांति की उम्मीद नहीं कर सकते। विद्वानों का मानना है कि बहस करने में कुशल लोग ‘सत्य की तरफ नहीं होते’ बल्कि साधारण तौर पर सिर्फ उन दलीलों के पक्ष में होते हैं, जो उन्हें सच लगती हैं या जिन्हें वे सत्य के तौर पर मनवाना चाहते हैं। इसीलिए अफवाह फैलाने वाले बड़ी चालाकी से अपनी फर्जी खबरों को उन दलीलों से जोड़ देते हैं जिन पर लोग विश्वास करते हैं। जैसे, दूसरे देशों में हुई घटनाओं को भारत की बता देना यह कह कर कि कश्मीर में जवानों को जला दिया गया।

फलां धर्म के लोगों ने फलां धर्म के लोगों को मार डाला। ऐसी खबरों को किसी और घटना के साथ जोड़ कर ऐसा माहौल बना दिया जाता है जिससे ज्ञानपूर्ण तर्क बेअसर हो जाता है। राजनीतिक संवेदनहीनता के चलते नए वर्ष में भी फर्जी खबरों का बाजार बंद नहीं होने जा रहा है। ये खबरें इसी तरह समाज में नफरत, भय और असुरक्षा का माहौल बनाती रहेंगी। उम्मीद ही कर सकते हैं जनता ज्ञानपूर्ण तार्किक शक्ति का परिचय देकर इन असामाजिक खबरों पर विश्वास करना बंद कर दे और सभी तरह के विचारों को सुनने और समझने का विवेक बनाए रखे।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तम नगर, नई दिल्ली

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