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चौपालः घाटे की खेती

आज भारत खाद्यान्न, फल, सब्जियां और दुग्ध उत्पादन में दुनिया के शीर्ष तीन देशों में है फिर भी अन्नदाता संकट में क्यों है?

Author February 23, 2018 4:20 AM

आज भारत खाद्यान्न, फल, सब्जियां और दुग्ध उत्पादन में दुनिया के शीर्ष तीन देशों में है फिर भी अन्नदाता संकट में क्यों है? आखिर क्या कारण है कि यहां खेती-बाड़ी की दशा साल-दर-साल बिगड़ती जा रही है। दरअसल, आज कृषि और किसान पर जो संकट आ पड़ा है उसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, किसान को लागत के हिसाब से दाम नहीं मिल रहे। आलम यह है कि लाखों किसान उत्पादन लागत भी नहीं निकाल पा रहे हैं। आखिर घाटे की खेती कब तक होगी? किसान कम उत्पादन करें तो मुसीबत और ज्यादा उत्पादन करें तो और अधिक मुसीबत। दूसरा संकट है कृषि जोतों का साल दर साल छोटा होना। आज कृषि जोत के 70 प्रतिशत से अधिक भाग एक हेक्टेयर से भी कम हैं। भारत में 13.78 करोड़ कृषि भूमि धारकों में से लगभग 11.71 करोड़ (लगभग 85 फीसद) छोटे और मझोले हैं, हालांकि वे ही हमारी खेती का भविष्य हैं और वर्तमान भी। लेकिन आबादी बढ़ने के साथ ही कृषि जोतें छोटी और अनुत्पादक होती जा रही हैं और छोटे किसानों की टिकाऊ आजीविका पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।

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‘उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान’ की सदियों पुरानी कहावत अब पलट गई है। खेती की जगह नौकरी-चाकरी अब देहाती दुनिया के बड़े हिस्से का सबसे सम्मानित पेशा बन गया है। खेती की प्रतिष्ठा और हैसियत में लगातार गिरावट आ रही है। गांव से शहर जाने की होड़ लगी है और युवाओं का खेती से मोहभंग होता जा रहा है। इससे भी बदतर बात यह है कि शिक्षित ग्रामीण युवा, जिनमें कृषि स्नातक भी शामिल हैं, खुद को लगभग पूरी तरह खेती-बाड़ी से अलग कर रहे हैं। यहां तक कि अधिकांश किसान नहीं चाहते कि उनकी अगली पीढ़ी भी उनके परंपरागत पेशे को अपनाए। आज देश की 35 फीसद आबादी 15 से 35 वर्ष के आयुवर्ग में आती है और उसमें से तकरीबन 75 फीसद ग्रामीण इलाकों में रहती है। एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक 42 फीसद किसान खेती छोड़ना चाहते हैं, अगर उन्हें रोटी-रोजी का अन्य बेहतर जरिया मिल जाए। ऐसे में खेती से इतने बड़े पैमाने पर मोहभंग गहन चिंता का विषय है।
कृषि को कमाई का बड़ा जरिया कैसे बनाया जाए? इसके लिए भारत इजराइल से काफी कुछ सीख सकता है। इजराइल ने मौसम की कठिन परिस्थितियों और जल की गंभीर कमी के बावजूद खेती में सृजनात्मकता और कृषि व कृषि-टेक्नोलॉजी उद्योगों के बीच तालमेल के जरिए बंजर रेगिस्तान को हरा-भरा बनाया है।

पानी की प्रत्येक बूंद, मृदा के प्रति इकाई क्षेत्र, उर्वरक के प्रत्येक कण और मानव श्रम के प्रत्येक क्षण से अधिकाधिक कृषि उत्पादन कैसे लिया जाए इसके लिए इजराइल ने आधुनिक कृषि तकनीक से पूरी दुनिया के सामने मिसाल पेश की है। अच्छी बात यह है कि पिछले दिनों इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सीधे तौर पर भारतीय कृषि में नई क्रांति लाने का प्रस्ताव दे दिया है, जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कृषि को एक व्यावसायिक मॉडल की तरह सरकारी तौर पर पेश किया जाए जिससे किसान आश्वस्त हो सकें कि कृषि भी एक व्यवसाय है और इसमें आर्थिक लाभ की असीम संभावनाएं हैं। साथ ही, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसानों तक नई तकनीक की जानकारी पहुंचे ताकि वे उसका फायदा उठा कर पैदावार और आय दोनों बढ़ा सकें।
’कैलाश मांजू बिश्नोई, जोधपुर

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