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चौपालः किसानों का कौन

छह-आठ महीने पहले ‘कैशलेस सोसाइटी’ और ‘लेसकैश सिस्टम’ की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता, मंत्री और अधिकारी अब किसानों को नकद भुगतान नहीं करने वाले व्यापारियों को चेतावनी और नोटिस दे रहे हैं।
Author November 1, 2017 02:28 am
अपने खेतों में खड़ा एक किसान। (Photo Source: Indian Express Archive)

छह-आठ महीने पहले ‘कैशलेस सोसाइटी’ और ‘लेसकैश सिस्टम’ की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता, मंत्री और अधिकारी अब किसानों को नकद भुगतान नहीं करने वाले व्यापारियों को चेतावनी और नोटिस दे रहे हैं। व्यापारियों की मुसीबत यह है कि बीस हजार से अधिक नकद भुगतान करने पर आयकर विभाग जुर्माना लगाता है। स्थानीय स्तर पर आयकर विभाग ने स्पष्टीकरण जारी किया है कि व्यापारी नकद भुगतान कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अगले दस वर्ष तक किसानों के दस्तावेज (खसरा नकल, ऋण पुस्तिका, मंडी की रसीद, आधार संख्या आदि) संभाल कर रखने होंगे वरना जांच होने पर ये दस्तावेज नहीं मिलने पर आयकर कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। प्रत्येक व्यापारी के लिए उन सभी किसानों के दस्तावेज दस वर्ष तक संभाल कर रखना अत्यंत कठिन है जिनसे उनका क्रय-विक्रय का व्यवहार है।

व्यापारियों की मांग है कि जब सराफा व्यवसायियों को दो लाख तक की बिक्री पर खरीदार का पैन नंबर नहीं लेने की छूट मिल सकती है, तो उसी तरह उन्हें भी किसानों के दस्तावेज रखने से छूट मिलनी चाहिए। फिर जो किसान मंडी में अपनी उपज बेचने आते हैं, जरूरी नहीं है कि उनके पास वे सभी दस्तावेज हों। खसरा नकल और ऋण पुस्तिका प्राप्त करने के लिए भी किसान सरकारी कर्मचारी (पटवारी, राजस्व निरीक्षक, मंडी सचिव आदि) को रिश्वत देने के लिए विवश होते हैं।

दूसरी ओर व्यापारियों ने भी सर्कल या कॉकस (गिरोह) बना लिया है। इसमें शामिल व्यापारी सामूहिक रूप से समर्थन मूल्य से कम दाम पर किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बाध्य कर रहे हैं। मसलन, मध्यप्रदेश में सोयाबीन का समर्थन मूल्य 3050 रुपए प्रति क्विंटल है, जबकि किसानों को अधिकतम 2750 रुपए ही दिए जा रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए भावांतर योजना लेकर आई है जो बुरी तरह विफल हो चुकी है। कृषिमंत्री स्वयं आरोप लगा रहे हैं कि व्यापारियों ने कॉकस बना लिया है। दूसरी ओर सत्ताधारी पार्टी के ही एक सांसद और पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा प्रमुख सचिव, कृषि विभाग को चेतावनी दे रहे हैं कि वे मंडियों में जाकर फीडबैक लें, वरना वे स्वयं यह काम करेंगे।

कुल मिला कर मध्यप्रदेश में न तो किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है और न विक्रय करने पर नकद भुगतान ही हो पा रहा है। नोटबंदी, नकदरहित लेनदेन, डिजिटलाइजेशन और फिर जीएसटी ने किसानों और आम आदमी की कमर तोड़ दी है। नोटबंदी के झटकों के बाद व्यापार-व्यवसाय कुछ पटरी पर आया ही था कि जीएसटी की दुरूह प्रणाली ने व्यवसायियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। किसान खेती करने लायक नहीं रहा है और व्यवसायी व्यापार करने लायक नहीं रह गया है। कृषि उपज मंडियों में रोज लड़ाई-झगड़े और तोड़-फोड़ हो रही है। लेकिन मुख्यमंत्री इन सब समस्याओं से बेफिक्र होकर मध्यप्रदेश की सड़कों को अमेरिका से अच्छी बताने में ही अपनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं।
’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

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