ताज़ा खबर
 

चौपालः न्याय की भाषा

जब संविधान लागू हुआ था तो हमने निश्चय किया था कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाएंगे।

Author January 23, 2018 3:37 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

जब संविधान लागू हुआ था तो हमने निश्चय किया था कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाएंगे। इस निश्चय के अनुरूप देश के प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक विभाग में यहां की क्षेत्रीय भाषाओं ने अपनी पहुंच बनाई है लेकिन न्यायपालिका में हिंदी आज भी न्याय के लिए भटक रही है। कैसी विडंबना है कि हमारे देश का कोई नागरिक पीड़ित होने बाद जब न्याय मांगने आता है तो न्यायपालिका यह कहती हुई प्रतीत होती है कि मैं तुम्हें न्याय देने को तैयार हूं लेकिन एक शर्त है कि तुम्हें अपनी बात मेरी भाषा (अंग्रेजी) में कहनी होगी! हालत यह है एक व्यक्ति वर्षों तक मुकदमा लड़ता है और तब जो ढेरों पन्नों का फैसला आता है वह भी अंग्रेजी में होता है। उस फैसले को देख कर मुकदमा करने वाला अपने वकील से पूछता है कि मुझे बस इतना बताइए कि मैं मुकदमा हारा या जीता?

तकरीबन तमाम राज्यों की निचली अदालतों में आज वहां की क्षेत्रीय भाषाओं में काम हो रहा है। साथ ही, अब वहां की न्यायिक सेवा परीक्षा में क्षेत्रीय भाषा को एक प्रश्नपत्र के रूप में सम्मिलित किया गया है। लेकिन उत्तर प्रदेश, जो कि हिंदी भाषी क्षेत्र की रीढ़ भी कहा जाता है, वहां निचली अदालतों में काम तो सारा हिंदी में होता है लेकिन न्यायिक सेवा परीक्षा में भाषा के प्रश्न पत्र में केवल अंग्रेजी पूछी जाती है जबकि दूसरे राज्यों में देखें तो गुजरात में अंग्रेजी के साथ गुजराती, महाराष्ट्र में अंग्रेजी के साथ मराठी, तमिलनाडु में अंग्रेजी के साथ तमिल पूछी जाती है।

उत्तर प्रदेश में हिंदी के साथ हो रहे इस दोहरे व्यवहार का सीधा असर न्याय पर भी हो रहा है। यहां ऐसी परीक्षा व्यवस्था है कि जजों को काम तो हिंदी में करना है लेकिन उस काम के लिए परीक्षा अंग्रेजी में होती है और उसका सीधा असर न्यायाधीशों की कार्यशैली पर भी हो रहा है। हालत यह है कि हिंदी अपने ही घर में और अपनी ही न्यायपालिका में न्याय को तरस रही है।
’गजेंद्र यादव, उत्तर प्रदेश

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App