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चौपालः खेलों की सुध

खेलों में भारत को विश्व विजेता बनाने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों पहले ‘खेलो इंडिया स्कूल गेम्स’ का शुभारंभ किया।

Author February 6, 2018 04:42 am

खेलों में भारत को विश्व विजेता बनाने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों पहले ‘खेलो इंडिया स्कूल गेम्स’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘खेलो इंडिया सिर्फ कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक मिशन है।’ यह शानदार पहल इसलिए है कि इस आयोजन से विभिन्न खेलों के 17 साल से कम उम्र के 1,000 प्रतिभावान बच्चों का चयन किया जाएगा। इन चयनित बच्चों को सरकार अगले आठ साल तक अपनी प्रतिभा में और निखार लाने के लिए उच्च स्तर की न केवल प्रशिक्षण सुविधाएं मुहैया कराएगी बल्कि इस अवधि तक इन बच्चों को सालाना पांच लाख रुपए भी दिए जाएंगे।

खेलों में भारत के फिसड््डी होने का सबसे बड़ा कारण स्कूली स्तर पर बच्चों में खेल प्रोत्साहन का अभाव रहा है। भारत में शिक्षा प्रणाली भी ऐसी है, जहां स्कूलों में खेल सिर्फ गैर शैक्षिक गतिविधि के अंतर्गत आते हैं, ताकि अच्छी नौकरी के लिए बॉयोडाटा थोड़ा अच्छा बन सके। ऐसे में खेलों में फर्श से अर्श तक पहुंचने वाले चीन से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। चीन प्रतिभाओं को बहुत कम उम्र में चुन लेता है और इन लड़के-लड़कियों को ओलंपिक में पदक हासिल करने लायक बनाने के वक्त तक मदद करता है। इन प्रतिभाओं को ज्यों ही नेशनल सेंटर में दाखिल किया जाता है उनकी जवाबदेही सरकार की हो जाती है और उन्हें किसी बात की चिंता नहीं करनी रहती। यहां तक कि अपनी शिक्षा के बारे में भी नहीं। लेकिन भारत में हम खेल की कीमत पर शिक्षा पर ध्यान देते हैं।

अब वक्त की मांग है कि देश में हर तहसील या उपखंड स्तर पर खेल स्कूल स्थापित किए जाएं, वहां खेल ही प्रमुख पढ़ाई हो और बाकी पढ़ाई का ज्यादा बोझ न हो। इन स्कूलों में ऐसे अत्याधुनिक खेल परिसरों का निर्माण किया जाए जहां खिलाड़ियों को हर सुविधा उपलब्ध हो, जैसी अमेरिका, चीन और रूस जैसे खेलों में अग्रणी देशों के खिलाड़ियों को मिलती हो। इन स्कूलों में उन चुनिंदा प्रतिभाओं को तराशा जाए जिनमें हुनर की कमी न हो। अगर हम 10 -11 साल के बच्चों को लेकर इस तरह से तैयारी करेंगे तो बहुत जल्दी बेहतरीन परिणाम मिलेंगे। इसके अलावा जो खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करते हैं उन्हें प्रतिमाह भत्ता या तनवाह मिले तो युवा और उनके परिवार वाले खेलों को भी करियर की तरह देखेंगे जिससे देश में खेल संस्कृति विकसित होगी।

आज क्रिकेट, बैडमिंटन और हॉकी जैसे खेलों में लीग प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। क्यों न इस लीग प्रणाली को शेष भारतीय खेलों में भी प्रयुक्त किया जाए, जिससे भविष्य में अन्य खेलों के खिलाड़ियों को बेहतर अवसर और आर्थिक स्थिरता मिल सके। अब समय आ गया है जब सभी खेल संघों में भी सफाई अभियान चला कर संगठनों का बेहतर प्रबंधन और अच्छे खिलाड़ियों को तैयार करने का जिम्मा पेशेवर और सक्षम पूर्व खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को दिया जाए ताकि खेलों इंडिया कार्यक्रम खेलों को आगे बढ़ाने के लिए एक जन आंदोलन का रूप धारण कर सके तथा भारत खेलों में भी एक महाशक्ति के रूप में तेजी से उभर सके।
’कैलाश मांजू बिश्नोई, जोधपुर

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