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चौपालः अराजक अतिवाद

उत्तर प्रदेश के एक शहर में हुए सांप्रदायिक दंगों की खबर पढ़ते हुए विचलित हो जाना स्वाभाविक था। खबर के अनुसार मोटर साइकिलों पर सवार कुछ युवक ‘तिरंगा यात्रा’ निकाल रहे थे।

Author January 31, 2018 02:58 am
यहां ‘तिरंगा यात्रा’ निकाले जाने और देशभक्ति के प्रदर्शन से किसी का कोई एतराज नहीं हो सकता, लेकिन भय इस बात का है कि झंडा उठाकर देशभक्ति के प्रदर्शन की इस सद्भावना यात्रा के संदर्भ और ‘तिरंगा यात्रा’ के भाषाई संकेत बदलते न चले जाएं।

उत्तर प्रदेश के एक शहर में हुए सांप्रदायिक दंगों की खबर पढ़ते हुए विचलित हो जाना स्वाभाविक था। खबर के अनुसार मोटर साइकिलों पर सवार कुछ युवक ‘तिरंगा यात्रा’ निकाल रहे थे। यात्रा के दौरान एक बस्ती में विवाद की स्थितियां पैदा हुर्इं और हिंसा फैलती गई। यहां ‘तिरंगा यात्रा’ निकाले जाने और देशभक्ति के प्रदर्शन से किसी का कोई एतराज नहीं हो सकता, लेकिन भय इस बात का है कि झंडा उठाकर देशभक्ति के प्रदर्शन की इस सद्भावना यात्रा के संदर्भ और ‘तिरंगा यात्रा’ के भाषाई संकेत बदलते न चले जाएं। हमने पहले भी रोजमर्रा के अभिवादन में ‘राम राम’ को ‘जय श्री राम’ में बरास्ते विनम्रता को जोशीले उद्घोष और बाद में डरा देने वाली ललकार में बदलते देखा है।

इसी तरह कई संगठनों द्वारा ‘सेना’ शब्द का प्रयोग अपने स्वघोषित नामों में किया जाने लगा है। ‘सेना’ शब्द से भी किसी युद्ध के लड़े जाने का आभास होने लगता है। वह संस्था चाहे लोगों के लिए सामाजिक, धार्मिक या आर्थिक कल्याण की गतिविधियों के लिए गठित की जाती रही हो लेकिन कुछ शब्दों की अपनी सत्ता बन ही जाती है और विशिष्ट ध्वनियां पैदा करती है। सीमा पर हमारी फौज दुश्मन के सामने हो तो सचमुच नागरिकों को आश्वस्ति रहती है कि देश सुरक्षित रहेगा। लेकिन जब देश के भीतर ‘सेना’ नामधारी कुछ संस्थाओं, संगठनों से जनता, शासन, प्रशासन और सरकारों का सामना होता है तो उनसे प्रतिरोध के पहले ही समर्पण की भूमिका में आ जाना एक तरह की विवशता ही हो जाती है। जैसा कि पूर्व में भी और हाल ही की कुछ हिंसात्मक घटनाओं में दिखाई दिया है।

मेरा मानना है कि हर असहमति और विरोध का प्रदर्शन समान स्तर पर जाकर एक ही धरातल की प्रक्रिया के तहत किया जाना ठीक कहा जा सकता है। मसलन, युद्ध का मुकाबला युद्ध से हो तो कोई बात नहीं लेकिन रचनात्मकता या किसी विशेष विधागत प्रसंग पर असहमति या नाराजगी का स्वर भी उसी रचनात्मक माध्यम में ही आना चाहिए। कविता का जवाब कविता में, प्रहसन से असहमति को किसी रचनात्मक पहल के रूप में अधिक लोकतांत्रिक कहा जाएगा। सिनेमा की असहमतियां या उसके दोषों को हिंसा की लाठी से नहीं खदेड़ा जा सकता। यह एक तरह का अराजक अतिवाद है।

इतिहास की समझ, असमझ, गलतियों, नीतियों, कूटनीतियों और अभिव्यक्तियों का विरोध नाट्य मंच या सिनेमाघरों में आग लगाकर करना आधुनिक और किसी सभ्य समाज की कोई गर्व करने वाली गतिविधि नहीं कही जा सकती। जब राजनीति के हलवे में भांग पड़ी हो तो ऐसी बावली हरकतें होंगी ही। नशे में कोई समाज कब तक अपने खुद के घर को बचाए रख सकेगा! विरोध का प्रतिरोध और एक आग के बाद नई चिंगारियां तब तक पैदा होती रहेंगी जब तक कि हम पढ़े-लिखे होने के बावजूद सचमुच शिक्षित नहीं हो जाते। दुख है कि यह हो नहीं पा रहा। ऐसे में शब्दों के प्रयोग, उनके निहितार्थ और संकेतों के भयावह होते जाने के खतरे सामने हैं। इसे समझा जाना चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि इसे करेगा कौन?
’ब्रजेश कानूनगो, गोयल रिजेंसी, इंदौर

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