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चौपालः खुदरा उदारवाद

भारत में खुदरा क्षेत्र में लगभग 2.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। हमारे समाज में औसतन एक कमाने वाले व्यक्ति के परिवार में पांच सदस्य होते हैं।

Author February 9, 2018 2:49 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में खुदरा क्षेत्र में लगभग 2.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। हमारे समाज में औसतन एक कमाने वाले व्यक्ति के परिवार में पांच सदस्य होते हैं। इसका मतलब है कि 12.5 करोड़ लोग लोगों की जीविका खुदरा क्षेत्र पर निर्भर है। यह वर्ग हमारे समाज में आर्थिक पैमाने पर मध्यम दर्जे या मध्यम से निचले दरजे का है लिहाजा, अर्थात खुदरा क्षेत्र से जुड़े लोगों की आर्थिक सुरक्षा बेहद संवेदनशील स्थिति में है। इसलिए किसी भी शर्त पर इस वर्ग के हितों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। देश की प्रगति के लिए कोई भी पहल स्वागतयोग्य है लेकिन उस पहल में इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रगति का लाभ समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।

केंद्र सरकार ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक से पहले विदेशी पूंजी को भारत की तरफ आकर्षित करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले लिए। इसी संदर्भ में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को और अधिक सरल बनाया गया ताकि निवेश के अनुकूल माहौल बन सके। इस तथ्य को ध्यान में रख कर अनेक कदम उठाए गए जिनमें खुदरा क्षेत्र में स्वैक्षिक रूप से 100 फीसद विदेशी निवेश सबसे महत्त्वपूर्ण है। हालांकि इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति पूर्व की यूपीए सरकार दे चुकी थी लेकिन उस फैसले में सरकार की विशेष अनुमति जरूरी थी, जिसे वर्तमान केंद्र सरकार ने अपने फैसले से स्वैच्छिक बना दिया है।

यदि भारत में इस तरह के निवेश होते हैं तो उनका क्या लाभ होगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि खुदरा क्षेत्र से जुड़े लोगों की आर्थिक सुरक्षा को खतरा हो। वैश्विक आर्थिक शक्ति के जोर पर विदेशी निवेशक बाजार पर आक्रामक प्रभाव डालने के साथ अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़-चढ़कर करेंगे। इसका दुष्प्रभाव रोजगार के साथ लघु एवं कुटीर उद्योगों पर भी पड़ने की संभावना है। इस फैसले से हो सकता है कि सरकार को अधिक राजस्व मिले, लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाली सेवा मिले। लेकिन यदि इसका खमियाजा देश के बड़े समूह की आर्थिक सुरक्षा ध्वस्त कर चुकाना पड़े, तो यह किसी भी स्थिति में अस्वीकार्य है। विकास की ऐसी धारा बहनी चाहिए जिसमें सभी वर्गों की भूमिका निहित हो और इससे हर वर्ग लाभान्वित हो।
’सुमित कुमार, गोविंद फंदह, सीतामढी

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