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चौपाल- साख की चिंता

इस सूचकांक को तीन मानकों के आधार पर तैयार किया गया है। इनमें देश में रहन-सहन का स्तर, पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊपन और आने वाली पीढ़ी को कर्ज से बचाने के उपाय शामिल हैं।
Author February 2, 2018 04:00 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हाल ही में विश्व आर्थिक मंच द्वारा ‘समावेशी विकास सूचकांक’ में भारत को 62वां स्थान मिला है, जबकि पड़ोसी पाकिस्तान 47वें और चीन 26वें पायदान पर हैं। हैरानी की बात है कि सूचकांक में जहां भारत को नुकसान हुआ है, वहीं पाकिस्तान ने पांच अंकों की छलांग लगाई है। लिथुआनिया को उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सूचकांक में पहला स्थान मिला है जबकि नॉर्वे विकसित देशों में पहले स्थान पर है। इस बार इस सूचकांक में 103 देशों को शामिल किया गया है। इस सूचकांक को तीन मानकों के आधार पर तैयार किया गया है। इनमें देश में रहन-सहन का स्तर, पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊपन और आने वाली पीढ़ी को कर्ज से बचाने के उपाय शामिल हैं। भारत की रैंकिंग में हुई इस गिरावट का एक मुख्य कारण देश में दिन-प्रतिदिन बढ़ रही प्रदूषण की समस्या है। प्रदूषण की स्थिति बहुत गंभीर है। राजधानी दिल्ली सहित यहां के महानगरों का और भी ज्यादा बुरा हाल है। लेकिन सरकार ने इसे रोकने के लिए कोई ठोस उपाय अभी तक नहीं किए हैं। न ही यह मुद्दा चुनावों के एजेंडे में प्रमुखता पाता है। आपातस्थिति में राजनेता विपक्षी दलों पर ठीकरा फोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा लेते हैं लेकिन हकीकत यही है कि इस समस्या का पूर्ण समाधान कोई नहीं चाहता जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की साख को ठेस पहुंचती है।

विश्व आर्थिक मंच की 48वां सालाना बैठक से ठीक पहले आई एक अन्य रिपोर्ट भी भारत के लिए अच्छी खबर नहीं लाई। इसके अनुसार पिछले साल की तुलना में भारत के ‘भरोसा सूचकांक’ में इस साल कमी आई है। हालांकि भारत अब भी ‘सरकार, कारोबार, स्वयंसेवी संगठन तथा मीडिया’ के मामले में सबसे भरोसेमंद देशों में बना हुआ है। रिपोर्ट में चीन आम जनसंख्या व जनता के बीच जानकारी दोनों श्रेणियों में पहले स्थान पर रहा। अफसोस की बात यह है कि भारत उन छह देशों में शामिल रहा, जिनका भरोसा सूचकांक सर्वाधिक घटा।

सर्वेक्षण में लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले मीडिया की स्थिति भी चिंताजनक रही। 28 में से 22 देशों ने मीडिया को गैर भरोसेमंद बताया है जिससे मीडिया की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि देश की वैश्विक स्तर पर घट रही इस साख के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या वाकई इससे दूसरे देशों को हम अपने यहां निवेश और रोजगार के लिए आमंत्रित कर सकते हैं? क्या कोई भी देश ऐसे मुल्क में निवेश कर पाएगा जिस पर लोगों का भरोसा घट रहा हो? क्या वाकई हम ऐसा ही भारत बनाना चाहते हैं? जरूरत है, देश में बढ़ रहे प्रदूषण पर जल्द से जल्द रोक लगाई जाए, लोगों के रहन-सहन के स्तर को सुधारा जाए, देश हित में कड़े से कड़े फैसले लिए जाएं। तभी हमारी साख को दुनिया भर में बचाया जा सकता है और हम अतुल्य भारत का निर्माण कर पाएंगे।
’मो ताहिर शब्बीर, सिकंद्राबाद, बुलंदशहर

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