Opinion about India leaps 30 places to 100th rank in World Bank’s ‘ease of doing business’ index - Jansatta
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चौपालः सुधार के बावजूद

विश्व बैंक की 2018 के लिए जारी कारोबारी सुगमता संबंधी ‘ईज आॅफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में भारत ने अभूतपूर्व 30 स्थानों की उछाल के साथ 100 वें पायदान पर पहुंच कर एक नया मुकाम हासिल किया है, लेकिन यह एक मात्र संकेत है।

Author November 2, 2017 3:25 AM
अरुण जेटली

विश्व बैंक की 2018 के लिए जारी कारोबारी सुगमता संबंधी ‘ईज आॅफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में भारत ने अभूतपूर्व 30 स्थानों की उछाल के साथ 100 वें पायदान पर पहुंच कर एक नया मुकाम हासिल किया है, लेकिन यह एक मात्र संकेत है। सरकार का लक्ष्य तो बड़ा है, क्योंकि अगले कुछ वर्षों में भारत को शीर्ष 50 में शुमार करने का लक्ष्य है। इस रिपोर्ट से मोदी सरकार के तरकश में नए तीर आ गए हैं। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब सरकार जीएसटी और विमुद्रीकरण को लेकर विपक्ष के निशाने पर है। दरअसल, यह रिपोर्ट इस बात की स्वीकारोक्ति है कि भारत ने हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार उन्मूलन और सुशासन के लिए जो कदम उठाए हैं वे सही दिशा में जा रहे हैं। स्वरोजगार और रोजगार की राह आसान हुई है जिसकी पुष्टि विश्व पटल पर हो रही है।

बिजली कनेक्शन आसानी से पाना, अनुबंध लागू करना, व्यवसाय शुरू करना, संपत्ति पंजीकरण, दिवालियेपन का निपटान, निर्माण प्रमाण पत्र, कर्ज पाना, छोटे निवेशकों की रक्षा, कर का भुगतान तथा सीमा पार कारोबार, इन्हीं 10 मापदंडों के आधार पर 190 देशों को कारोबारी सुगमता की रैंकिंग दी गई है। विश्वबैंक के मुताबिक न्यूजीलैंड दुनिया में कारोबार के लिहाज से सबसे बेहतर जगह है। उसके बाद क्रमश: सिंगापुर, डेनमार्क, दक्षिण कोरिया और हांगकांग का स्थान है।

भारत अकेला देश है जिसका नाम रिपोर्ट में खास तौर पर सुधारों के लिए लिया गया है। भारत की रैंकिंग में सबसे ज्यादा उछाल कर-सुधारों के कारण आया है। हालांकि वस्तु एवं सेवा कर का प्रभाव अगली रैंकिंग में देखने को मिलेगा, क्योंकि इसे पहली जुलाई 2017 से ही लागू किया गया है। यहां एक बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि कारोबारी माहौल सहूलियत भरा दिखने में और होने में अंतर होता है। कई बार चीजें कागजों पर देखने में जितनी आसान होती हैं, उतनी ही धरातल पर मुश्किल होती हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उद्योग और व्यापार जगत भी छलांग लगता हुआ दिखे। यह सुनिश्चित करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है, क्योंकि रोजगार के अवसर बढ़ाने की सख्त जरूरत है। इस जरूरत की पूर्ति तभी होगी जब बड़े उद्योगों के साथ छोटे व मंझोले उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जाए और व्यापार सुगमता के साथ रोजगार सुगमता भी लाई जाए।

विकास की राजनीति करने के नाम पर उद्योगपतियों की तरफदारी वाली नीति और विचार से कोई भी राजनेता या नीति-निर्धारक अनजान नहीं है। इसके चलते समाज में फैली विसंगतियों के परिणामस्वरूप आज आत्महत्याएं, पारिवारिक क्लेश, बेरोजगारी जैसी समस्याओं ने देश की दुर्दशा कर रखी है। इससे यह परिदृश्य उभरता है कि भारतीय राजनीति को भारतीय समाज की किसी भी वास्तविक और गंभीर समस्या से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उसे जापान को दरकिनार कर यूरोप और अमेरिका की तर्ज पर विकास के लिए समर्पित रहना है और बीच-बीच में किसी भी एक समस्या पर विलाप करने लगना है। भारत और जापान का सहयोगात्मक रुख भारत के निर्माण में एक बड़ी क्रांति ला सकता है, जिससे बेरोजगारी दूर होगी और नए क्षेत्रों में अवसर खुलेंगे, साथ ही विकास के नए आयाम भी स्थापित होंगे।
’रजनीश भगत, मुजफ्फरपुर, बिहार

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