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चौपालः बोझ तले बचपन

बस्ते का बोझ कम करने के लिए उठाए गए कदम का स्वागत किया जाना चाहिए।

Author March 9, 2018 02:25 am
सरकार बरसों से चले आ रहे एक प्रयास को पूरा कर पाएगी या नहीं, यह सोचने का विषय है। आजादी के बाद से ही बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं। (Photo Source- Express)

बस्ते का बोझ कम करने के लिए उठाए गए कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। सरकार बरसों से चले आ रहे एक प्रयास को पूरा कर पाएगी या नहीं, यह सोचने का विषय है। आजादी के बाद से ही बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं। यह एक प्रकार से शिक्षा के क्षेत्र में कायम कुप्रथा कहें तो कोई गलत नहीं होगा। क्या इसे खत्म करने के लिए सरकार कोई कड़ा फैसला ले पाएगी? दरअसल, बस्ते के बोझ तले दबे बच्चे आज मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहे हैं और साथ में शारीरिक रूप से भी कमजोर होते जा रहे हैं। सच्चाई यही है कि आज बचपन पढ़ाई के एक चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। वह अपने आपको सही रूप से विकसित नहीं कर पा रहा है।

सवाल है कि हमारे देश के बच्चे गुणवत्ता की पढ़ाई के बजाय बस्ते का बोझ ढोने में क्यों लगे हुए हैं। हमारे देश की शिक्षा नीति की तरफ सरकारों ने ध्यान नहीं दिया है। जो शिक्षा नीति पहले थोप दी गई है, उसी को घसीटते आ रहे हैं। किसी भी देश की शिक्षा ही उसकी दिशा और दशा तय करती है। आज उस लार्ड मैकाले की शिक्षा बच्चों को पढ़ाई जा रही है, जिसने कहा था कि मैं भारत को ऐसी शिक्षा नीति दूंगा, जिससे आने वाली पीढ़ी मानसिक रूप से गुलाम होंगी। आज वही हो रहा है। उसी की देन है कि आज तक बच्चों को बस्ते से मुक्ति नहीं मिल पाई है।

आज जिस तरह से शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है, उसी से बच्चों पर शिक्षा का दबाव बढ़ता चला गया है। छोटे बच्चों को स्कूल से इतना होमवर्क दे दिया जाता है, जिसे लेकर वे तनाव में रहने लगे हैं। शिक्षा के बोझ से बचपन छिनता जा रहा है। मासूमियत ट्यूशन ओर होमवर्क के बीच फंस कर रह गई है। बच्चे आज कई तरह के डरों का शिकार हो रहे हैं।
कभी शिक्षा पद्धति ऐसी होती थी जहां बच्चों पर पुस्तकों का बोझ कम होता था। जीवन को क्रियात्मक और ऊर्जावान बनाने पर बल दिया जाता था। आज हालत यह है कि बच्चे रीढ़ की हड्डी और कमर के दर्द से परेशान रहते हैं। इस विषय पर अभिभावकों और स्कूल संचालकों ने कभी मंथन नहीं किया कि बोझ कैसे कम हो। बच्चे उस दौर से गुजर रहे हैं कि पढ़ाई के सिवा जीवन में खुशियां और सुख के साथ संसार और सृष्टि से परिचित होने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। अब देश के सभी अभिभावकों को इसके लिए अभियान चलाना होगा कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास सही रूप से हो।
’जयदेव राठी भराण, रोहतक, हरियाणा

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