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चौपालः तब और अब

गुजरात के विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने तय लक्ष्य 150 से बहुत दूर 99 पर क्या अटकी कि उसकी उलटबांसी शुरू हो गई है।

Author January 13, 2018 2:09 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

गुजरात के विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने तय लक्ष्य 150 से बहुत दूर 99 पर क्या अटकी कि उसकी उलटबांसी शुरू हो गई है। सनातनी संस्कृति की पैरोकार रही भाजपा की सरकार ने अब सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर कह दिया है कि स्वेच्छा से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध नहीं माना जाए। जबकि मनमोहन सिंह सरकार ऐसा ही मंतव्य सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखने पर विचार कर रही थी तो उसने हायतौबा मचाते हुए तमाम भद्दे विश्लेषण और संज्ञाओं से उसकी आलोचना की थी। लेकिन अब वही बात ये खुद कह रहे हैं तो उन संस्कृति रक्षकों के बोल ही नहीं निकल रहे। ऐसा ही एक दूसरा मामला सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य करने को लेकर सामने आया है।

केंद्र की सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते ही भाजपाइयों ने राष्ट्रवाद के नये-नये प्रयोग शुरू कर दिए थे और उसी कड़ी में अपने भक्तों से याचिका दायर करा कर सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया गया था। मगर अब उसकी व्यावहारिक कठिनाइयों और राष्ट्रगान के अपमान की घटनाएं सामने आने के बाद वापस पिछली गली से सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दे दिया है कि इसे अनिवार्य न किया जाए। तीसरा, आधार को लेकर भी सरकार ने पलटी मारी है। आधार डाटा बिकने का पर्दाफाश करने वाली पत्रकार द्वारा सामने लाई गई सच्चाई स्वीकार करने और सुधारात्मक परिवर्तन करने के बजाय उसके खिलाफ एफआईआर कराने की नीयत सामने आना और कड़े विरोध के बाद फिर आधार सुरक्षा को द्विस्तरीय बनाने की बात करना एक और पलटी को दर्शाता है। लेकिन इससे भी क्या वे सारे करोड़ों आधार डाटा सुरक्षित हो पाएंगे जो पहले ही बतौर पहचान के दिए जा चुके हैं?

इसी कड़ी में एक और पलटी सिंगल ब्रांड में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति देना है जबकि विपक्ष में रहते हुए भाजपा इसका कड़ा विरोध कर रही थी। आज के प्रधानमंत्री 2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए तब के प्रधानमंत्री को यह कहते हुए कोस रहे थे कि ‘मैं हैरान हूं प्रधानमंत्री क्या कर रहे हैं! रिटेल के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दे दी गई है। ऐसे में तो छोटे व्यापारियों की दुकानों में ताला लग जाएगा।’ उसी समय आज के वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे थे कि सरकार में आकर भी हमारा नजरिया नहीं बदलने वाला है। खुदरा ही नहीं, इससे पहले ये रक्षा जैसे अतिसंवेदनशील क्षेत्र में भी शत प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमतियोग्य बना चुके हैं। संस्कृति, राष्ट्रवाद और स्वदेशी का इनका नारा कितना खोखला है, इसे इनकी कथनी और करनी से पहचान सकते हैं।

कश्मीर को लेकर भी इनकी यही दोगली स्थिति सामने आती है। इनकी सहयोगी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती कहती हैं कि कश्मीर समस्या का समाधान भारत-पाक वार्ता से ही संभव है। इसी पार्टी के एजाज मीर मारे गए आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखने की बात करते हैं। सारे कथित राष्ट्रवादी मौनव्रत में सत्ताभोग रहे हैं। धारा 370 हटाने के अपने कथित प्रण को भी भूल गए हैं। मोदी सरकार की इस उलटबांसी पर किसी और की चोट उतनी महत्त्व नहीं रखती जितनी उनके अपनों द्वारा की गई टिप्पणी रखती है। यशवंत सिन्हा ने पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी और अब खुदरा क्षेत्र पर लिए फैसले पर भी टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘हम विपक्ष में थे तो पुरजोर विरोध करते रहे, लेकिन अब उसे ही मंजूरी देकर भाजपा अपनी नीतियों से भटक गई है।’
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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