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चौपालः रोजगार और सरकार

स्वतंत्रता के बाद से ही सरकारी महकमों की वर्ग ग और घ सेवा की श्रेणी सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाली रही है।
Author December 6, 2017 03:30 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्वतंत्रता के बाद से ही सरकारी महकमों की वर्ग ग और घ सेवा की श्रेणी सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाली रही है। एक और बात ध्यान रखने योग्य है कि किसी कार्यालय में इन दोनों वर्ग के लोग ही पचास फीसद से अधिक शारीरिक और मानसिक श्रम कर देते हैं। वर्ग क और ख के लोग हस्ताक्षरकर्ता और निर्णय लेने वाले होते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक विशेष परिवर्तन हो रहा है। सरकार क्रमिक रूप से समूह ग और घ की सेवाओं को ‘आउटसोर्स’ कर रही है, यानी ठेके पर दे रही है। बल्कि समूह घ को समाप्त कर दिया गया है और वर्ग ग में ही एक एमटीएस (मल्टी टास्किंग स्टाफ) पद का सृजन किया गया है। पहले ड्राईवर, माली, चपरासी, रसोइया आदि कई पद होते थे, जो अब कुछ ही विभागों में पहले के बचे हुए लोग हैं। इस पद पर नियोजित व्यक्ति से कोई भी कार्य लिया जाता है। हालांकि इन पदों में काफी कटौती कर दी गई।

इसके पीछे सरकार की एक व्यवस्थित सोच रही है कि इस निर्णय से सरकार पर आर्थिक दबाव कम होगा। एमटीएस का कार्य अगर ठेके पर दे दिया जाए तो जिस काम के लिए एक स्थायी नियोजित व्यक्ति को वेतन-भत्ते मिला कर अगर तीस हजार रुपए देने पड़ते हैं, वह काम दस-बारह हजार में ही हो जाएगा। कई अर्थशास्त्री इस निर्णय को उचित और आर्थिक हित में मानते हैं, पर भारत जैसे खुद को लोक कल्याणकारी और समाजवादी मानने वाले राज्य के लिए यह कहां तक उचित है? एक पढ़ा-लिखा समझदार आदमी खुद सोच सकता है कि क्या इस निर्णय से सामाजिक और आर्थिक न्याय मिल सकता है जो कि संविधान की प्रस्तावना में वर्णित है?

इसके अलावा, सरकारी महकमे चाहें तो सीधे तौर पर किसी व्यक्ति को ठेके पर काम पर रख सकते हैं। लेकिन सामान्यत: ऐसा नहीं किया जाता और किसी बिचौलिये (कंपनी या व्यक्ति) के माध्यम से ठेके पर लोग रखे जाते हैं। इस तरह ठेके पर नियोजित व्यक्ति के श्रम अधिकारों को पूरा करने का दायित्व सरकार पर न रह कर ठेकेदार का हो जाता है। यह अलग बात है कि श्रम नियमों का पालन करवाने के लिए श्रम मंत्रालय और विभाग हैं, जो कागजी तौर पर नियमों का अक्षरश: पालन करवाते दिखते हैं, भले ही सच्चाई कुछ और हो। इस तरह सरकार अपना पल्ला छुड़ा लेती है।

ठेके पर नियोजित व्यक्ति को अपनी नौकरी कच्ची होने की चिंता होती है, उसे जब भी ठेकेदार या नियोजक चाहे तो निकाल सकता है। उसे उतनी छुट्टियां और भत्ते नहीं मिलते, जितने एक स्थायी नियोजित व्यक्ति को मिलते हैं और न ही भविष्य सुरक्षित रहने की कोई आशा। एक तरह से देखा जाए तो यह सरकार के निजीकरण का प्रयास है। सरकार इसे उचित मानते हुए अब ठेके की व्यवस्था केवल ग और घ वर्ग के लिए ही नहीं कर रही, बल्कि शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर आदि के कार्य को भी ठेके पर दे रही है। इस सबसे भले ही सरकार को आर्थिक बचत हो जाए, पर मानव विकास को सुनिश्चित करना संभव नहीं है।
’रामकृष्ण, मोतिहारी, बिहार

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