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चौपालः अपराध की सत्ता

राजनीति से आपराधीकरण को रोकने के प्रयास पहले भी किए जाते रहे है, लेकिन ‘ज्यों-ज्यों दवा की, रोग बढ़ता ही गया’ वाली कहावत चरितार्थ होती रही है। देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टियां उम्मीदवार के चुनाव में जीतने के लक्ष्य को लेकर टिकट वितरित करती है, बेशक टिकटार्थी कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो!

Author Published on: February 15, 2020 4:11 AM
सुप्रीम कोर्ट ( इंडियन एक्सप्रेस फोटो: प्रवीण खन्ना)

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत ही सराहनीय और महत्त्वपूर्ण है, जिसमें राजनीतिक पाटियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के चयन के कारणों को अपलोड करें। देश की सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश है कि राजनीतिक पार्टियों को अड़तालीस घंटे के भीतर यह कार्य पूरा कर लेना है। साथ ही बहत्तर घंटे के भीतर इसका विवरण चुनाव आयोग को भी दिया जाए। फैसले से इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि माननीय न्यायालय देश मे बढ़ते अपराधीकरण के प्रति कितना चिंतित दिखाई दे रहा है।

राजनीति से आपराधीकरण को रोकने के प्रयास पहले भी किए जाते रहे है, लेकिन ‘ज्यों-ज्यों दवा की, रोग बढ़ता ही गया’ वाली कहावत चरितार्थ होती रही है।
देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टियां उम्मीदवार के चुनाव में जीतने के लक्ष्य को लेकर टिकट वितरित करती है, बेशक टिकटार्थी कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो! उम्मीदवार पर कितने भी संगीन आरोप लगे हों , पार्टियों को इस बात से कोई भी लेना-देना नहीं रहता। ऊपर से तर्क यह दिया जाता है कि वह जनता द्वारा चुना गया जनता का जनप्रतिनिधि है, इसलिए वह दोषी या अपराधी नहीं है।

पिछले चार वर्षों के लोकसभा चुनावों की चर्चा की जाए तो जहां वर्ष 2014 में 21 फीसद दागी सांसद निर्वाचित हुए थे तो वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में 29 फीसद दागी सांसद निर्वाचित हुए। देश कहां जा रहा है? देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों का लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्त कर सत्ता सुख भोगना रह गया है। जनता के हितों से उनका कोई भी लेना देना नहीं है। यह तो भविष्य में ही पता चलेगा कि सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला कितना लागू हो पाएगा।
’सुरेश गोयल, हिसार, हरियाणा

जाति का दंश
भारतीय लोकतंत्र और इसके संविधान ने सबको बराबरी का हक दिया है, लेकिन आजादी के बाद लंबे अंतराल के बाद भी जातिगत भेदभाव बड़ी बीमारी बनी हुई है। जातिगत भेदभाव को भेदभाव करने वाले ही खत्म कर सकते हैं। वह तभी संभव है, जब वे मानसिकता बदल लें। सवाल उठता है कि जो भेदभाव जातियों की वजह से कायम है, वह बिना जाति खत्म हुए कैसे खत्म होगा? उच्च कही जाने वाली जाति के लोगों को समझना होगा और उन्हें मानवता के चश्मे को पहन कर ही जीना होगा। यह जाति आधारित भेदभाव पीढ़ियों से जहर घोल रहा है। दलितों को घोड़ी चढ़ने से रोकना,उन्हें नीचे बिठाना, श्मशान में भी भेदभाव जैसी घटना भारत की छवि पर बट्टा लगा रही हैं। मानव समाज पहले से ही कई धर्मों में बंटा हुआ है, ऊपर से जातियों में बांटना बेहद त्रासद है। देश में अमीरी और गरीबी की खाई बहुत बड़ी है फिर जातियों की खाई ने भारतीय लोकतंत्र को कमजोर किया है। ऐसे ही चलता रहा तो तो देश महापुरुषों के सपने का भारत नहीं बन पाएगा।
’रनजीत मीणा, अवंतिका रोहिणी, दिल्ली

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