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चौपालः क्या औचित्य

बाबा साहब ने अपने जीवन में कई जन-आंदोलन चलाए। मुख्यत: मंदिरों में दलितों के प्रवेश और सार्वजनिक तालाबों आदि से उनके पानी पीने के अधिकार मनवाने के लिए ये किए गए।

Author April 6, 2018 3:09 AM
लगभग छह साल से अधिक के इस आंदोलन पर्व को बाबा साहब ने ‘धर्म संगर’ (धर्म संघर्ष) का नाम दिया, जिसमें हिंसा के अधर्म का उनकी दृष्टि में कोई स्थान नहीं था।

बाबा साहब ने अपने जीवन में कई जन-आंदोलन चलाए। मुख्यत: मंदिरों में दलितों के प्रवेश और सार्वजनिक तालाबों आदि से उनके पानी पीने के अधिकार मनवाने के लिए ये किए गए। इनके दौरान स्वयं उन पर छुटपुट हमले हुए, वे घायल हुए लेकिन उनकी अपील के कारण आंदोलन पूरी तरह शांत बने रहे। लगभग छह साल से अधिक के इस आंदोलन पर्व को बाबा साहब ने ‘धर्म संगर’ (धर्म संघर्ष) का नाम दिया, जिसमें हिंसा के अधर्म का उनकी दृष्टि में कोई स्थान नहीं था। उन्होंने एक बार कहा भी था कि मेरे सत्याग्रहियों की अहिंसा गांधीजी को भी लजाने वाली रही है। लेकिन बाबा साहब पर खुद का एकाधिकार समझने वाली बहुजन समाज पार्टी और उसकी सुप्रीमो मायावती के हालिया हिंसक भारत बंद ने बाबा साहब की विरासत को घायल किया है। खास तौर पर स्त्रियों-बच्चों पर हमले, लूटमार जैसी घटनाओं ने इस पार्टी का निंदनीय चेहरा देश के सामने ला दिया है। और फिर यह भारत-बंद जिस चीज के विरुद्ध हुआ, वह तो मायावती मुख्यमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल (2007-2012) में स्वयं कर चुकी हैं। उन्होंने ही मई 2007 में यह सरकारी आदेश जारी किया था कि अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम में एफआईआर होने पर सर्किल आॅफिसर स्तर के अधिकारी द्वारा प्रारंभिक जांच के बाद ही गिरफ्तारी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यही तो फैसला दिया है। फिर विरोध का क्या औचित्य?

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वैसे पिछले कुछ समय से बाबा साहब और उनके बताये रास्ते से बसपा की दूरियां साफ दीखने लगी थीं। मायावती ने पहले उस पार्टी से गठजोड़ किया जिसके सबसे बड़े नेताओं में से एक आजम खान ने बाबा साहब को भूमाफिया बताया था। जब 2017 के प्रारंभ में सपा नेता ने एक जनसभा में यह आपत्तिजनक बात कही थी, उस वक्त भी मायावती खामोश रही थीं। आजम ने मंत्री रहते हुए रामपुर में एक मॉल बनाने के लिए समीपस्थ वाल्मीकि बस्ती को बुलडोजरों से गिरवा दिया। मायावती ने कोई विरोध दर्ज नहीं कराया। अखिलेश यादव सरकार ने बाबा साहब के पुण्यदिवस एवं संत रविदास जयंती के अवकाश रद्द कर मुसलिम त्योहारों के दो अवकाश बढ़ाए मगर मायावती उदासीन रहीं।

फिर अचानक बाबा साहब के नाम में उनके पिता रामजी सकपाल का नाम जोड़े जाने पर वे विरोध करने पर आमादा हो गर्इं! बाबा साहब की तमाम डिग्रियों व पुस्तकों, संविधान सभा और राज्यसभा, जिनके वे सदस्य रहे, के कार्यवाही रिकॉर्ड, संविधान की मूल हिंदी प्रति पर उनका हस्ताक्षर, उन पर जारी किये गए दोनों डाक टिकटों- सभी में उनके नाम के मध्य में राम मौजूद है। मायावती को राम शब्द इतना ही अप्रिय है तो अपनी माता रामरत्ती तथा अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के नामों से उसे पहले हटातीं?
’अजय मित्तल, मेरठ

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