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चौपालः अपराध की राजनीति

आज भारत में राजनीति का अपराधीकरण समाज के सभी घटकों के लिए चिंतनीय विषय हो गया है। यह राजनीतिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

Author April 13, 2018 2:33 AM
उन्नाव जिले के बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर। जिन पर रेप का आरोप है(Photo: PTI)

आज भारत में राजनीति का अपराधीकरण समाज के सभी घटकों के लिए चिंतनीय विषय हो गया है। यह राजनीतिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। इसका सबसे बड़ा कुप्रभाव यह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि भारतीय राजनीति में प्रवेश करने की अनिवार्य योग्यता सरीखी हो गई है। बाहुबलियों को चुनाव में उतारना जीत की गारंटी माना जाने लगा है। भारत में राजनीति अब समाज सेवा का मंच न होकर मोटी कमाई वाला व्यवसाय बन कर रह गया है। इसमें अपराधियों की बढ़ती सफलता और वर्चस्व युवाओं को आपराधिक गतिविधियों में सम्मिलित होने का प्रलोभन दे रहे हैं।

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए केंद्र सरकार से ऐसे सांसदों-विधायकों की संख्या व सूची पेश करने के लिए कहा था जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे विचाराधीन हैं। केंद्र सरकार ने सभी उच्च न्यायालयों के जरिए जानकारी एकत्र करके सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र और गोवा को छोड़कर पूरे देश में सांसदों-विधायकों की कुल संख्या 4,896 है और इनमें से 1,765 सांसदों और विधायकों पर 3,045 आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें सबसे ऊपर उत्तर प्रदेश है। उसके बाद तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र, केरल और कर्नाटक हैं।

देश की राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के लिए अपराधियों के राजनीति में भाग लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना बहुत जरूरी है। अपराध का पोषण करने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता खत्म करना इस समस्या पर सबसे कारगर उपाय साबित हो सकता है। साथ ही, सरकार और चुनाव विश्लेषकों को मिल कर ‘बहुमत के विरोधाभास’ को दूर करने का उपाय तलाशना होगा। इसके लिए सूची प्रणाली, द्विध्रुवीय राजनीतिक व्यवस्था का उदय आदि विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
’देवेंद्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान

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