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चौपालः ड्रैगन के इरादे

भारत की उनतालीस हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर 1962 में कब्जा कर लेने के बाद अब चीन की नजर असम के प्रवेश द्वार तवांग सहित समूचे अरुणाचल प्रदेश पर टिकी हुई है।

भारत की उनतालीस हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर 1962 में कब्जा कर लेने के बाद अब चीन की नजर असम के प्रवेश द्वार तवांग सहित समूचे अरुणाचल प्रदेश पर टिकी हुई है। पूर्व-पश्चिम गलियारे के अंतर्गत वह भारत की सीमा पर कई हवाई अड्डे बना चुका है। तिब्बत के दक्षिणी-पश्चिमी किनारे पर नागरी में वह सबसे ऊंचे हवाई अड््डे का भी निर्माण कर चुका है। अक्साईचिन में 37555 वर्ग किलोमीटर और शकक्षम घाटी में 5180 वर्ग किलोमीटर का इलाका, जो जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, आज चीन के कब्जे में है। इसी तरह अरुणाचल की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन, जिसके अंतर्गत तबाड् में एक चीनी हेलीपैड, सामद्रोंग चू घाटी, अस्पिल व लंगर लंगर कैंपस, लांगजू शामिल हैं, चीन के कब्जे में हैं। इनमें अक्साईचिन का अधिकांश हिस्सा तो उसने बगैर लड़ाई के 1951 के बाद आठ-दस साल में कब्जाया था।

क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जो अपनी जमीन बिना लड़े ही दूसरों को कब्जाने दे? अफसोस इस बात का है कि जिनके ऊपर देश की सीमाओं की हिफाजत की जिम्मेदारी थी, वे ही कहने लगे कि जहां घास का तिनका तक नहीं उगता उस भूमि की क्या रक्षा करनी! आज हालत यह है कि चीन ने भारत को चारों तरफ से घेर लिया है। भारतीय सीमा में घुसने में अब उसे ज्यादा समय नहीं लगेगा। ऐसी स्थिति में भारत कैसे अपनी सुरक्षा कर पाएगा? क्या हमारी सेना इतनी सक्षम है कि चीन की सीमा में घुस कर उसे सबक सिखा सके? क्या हमारी टेक्नोलॉजी इतनी उन्नत है कि हम युद्ध की हालत में घर बैठ कर चीन को करारा जवाब दे सकें?

इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद देश के सुरक्षा परिदृश्य में काफी बदलाव आया है। चीन जान चुका है कि भारत 1962 की स्थिति में नहीं है और युद्ध की हालत में जितना नुकसान भारत का होगा उतना ही चीन का भी होगा। इस सबके बावजूद भारत के प्रधानमंत्री को चीन को घेरने की तैयारी युद्ध स्तर पर शुरू कर देनी चाहिए। चीन के दुश्मनों की संख्या काफी बड़ी है। हमें उन्हें विश्वास में लेना चाहिए। आज की लड़ाई पूरी तरह टेक्नोलॉजी पर निर्भर होती है। अमेरिका में कई भारतीय रक्षा वैज्ञानिक हैं। इन्हें निमंत्रण देकर हमें भारत की सुरक्षा में लगाना चाहिए।
जो कार्य हमें चीन से बचा सकता है वह है चीन के साथ दृढ़ता से पेश आना, खुल कर उसके नापाक इरादों का विरोध करना और अमेरिका को चीन के विरुद्ध और अपने पक्ष में हस्तक्षेप के लिए तैयार करना। इसके अलावा चीनी उत्पादों के लिए भारत में समय-समय पर रुकावट पैदा करते रहना। हमें चीन की कूटनीति की वैश्विक स्तर पर काट के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए।
’आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ

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