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चौपालः संस्कार से दूर

कुछ दिन पहले उच्च शिक्षा प्राप्त एक प्रोफेसर बेटे ने अपनी 64 वर्षीय बीमार मां को चौथी मंजिल से नीचे फेंक दिया।

Author January 25, 2018 4:09 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

कुछ दिन पहले उच्च शिक्षा प्राप्त एक प्रोफेसर बेटे ने अपनी 64 वर्षीय बीमार मां को चौथी मंजिल से नीचे फेंक दिया। एक अन्य मामले में बेटी ने अपने 90 साल के पिता और 80 साल की मां को घर से निकाल दिया। इन त्रासद घटनाओं के मूल में हमारी शिक्षा व्यवस्था है जिसकी तरफ बहुत पहले प्रेमचंद्र ने इशारा कर दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किए डालती है।’ यह बात सोलह आने सच है कि आज की शिक्षा में संस्कार नामक चीज को दीमक लग गई है। अब युवाओं में मानवीय गुणों को समझने की जिज्ञासा, संस्कार न के बराबर हैं और इसीलिए ऐसी घटनाएं देश में प्रतिदिन घट रही हैं। अच्छी शिक्षा के मूल में ज्ञान, संस्कार, मानवीय गुण और अच्छे आचरण का प्रमुख स्थान है लेकिन बाजारीकरण के दौर में ये सब चीजें बेमानी हो गई हैं।

शिक्षा का वास्तविक अर्थ होता है कि मनुष्य कुछ सीख कर अपने को पूर्ण बना सके। हर माता-पिता की कोशिश रहती है कि उसके बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा हासिल कर ऊंचे से ऊंचे ओहदे पर पहुंचें लेकिन उन्हीं मां-बाप के साथ मारपीट, बुरे बर्ताव या गाली-गलौज की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। आधुनिकीकरण के इस दौर की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर आदमी जल्द से जल्द वह स्थान हासिल कर लेना चाहता है, जिससे उसकी आगे की जिंदगी आसान बन सके और उस मुकाम को हासिल करने के लिए वह अपने माता-पिता को मारने-पीटने से भी नहीं चूक रहा है। आज के इसी प्रकार के शिक्षित व्यक्तियों की गांव के बीस वर्ष पूर्व के अनपढ़ व्यक्तियों से अगर तुलना करें तो देखेंगे कि वे एक-दूसरे से प्यार करने वाले, सुख-दुख बांटने वाले थे और अब ये शिक्षित होकर भी अधिक ईर्ष्यालु, स्वार्थी हो गए हैं।

आज आप किसी शहर से दूसरे शहर के बीच अगर यात्रा करें और नजर दौडाएं तो सबसे ज्यादा स्कूल, कॉलेज के भवनों को सड़क किनारे खड़े अथवा बनते हुए पाएंगे। ये प्राइवेट स्कूल केवल शिक्षा की दुकानें बनकर रह गए हैं। सभी में एक से बढ़कर एक ऊंची फीस, सुविधाओं के नाम पर तरणताल, वातानुकूलित कक्षाएं तो मिल जाएंगी पर मानवीय गुणों को समझाने या घर-परिवार के आवश्यक संस्कारों के लिए कोई अतिरिक्त कक्षा नहीं मिलेगी। यह दर्शाता है कि वर्तमान शिक्षा पद्धति बाजारीकरण की भेंट चढ़ चुकी है। आज आप बस इन स्कूल की मासिक फीस भरते रहिये, ये आपके बच्चे का शैक्षिक रिकार्ड बेहतर बताते रहेंगे।

इसी की परिणति है कि आज मां-बाप लोगों को एक बोझ लगने लगे हैं। पश्चिमी देशों की तरह रहन-सहन की चाह में मां-बाप बच्चों को रोड़ा लगते हैं, तभी ऐसी आपराधिक घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। आज आप किसी भी वृद्धाश्रम में चले जाएं, ज्यादातर जगहों की स्थिति यही है कि वहां अपनों के सताये लोग रह रहे हैं। सरकार को ध्यान देना होगा कि हमारी शिक्षा केवल काम चलाऊ न हो, बल्कि संसार, समाज के बीच रहना सिखाए, मानवतावादी बनाए।
’अपूर्व वाजपेयी, शाहजहांपुर

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