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चौपालः संकट की तस्तक

मौसमी बदलावों का अध्ययन करने वाली संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि 2016 में पृथ्वी पर कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गई है।

Author November 4, 2017 3:38 AM
बीते सत्तर सालों में वातावरण में कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि शीत युग के अंत से 100 गुना ज्यादा है।

मौसमी बदलावों का अध्ययन करने वाली संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि 2016 में पृथ्वी पर कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गई है। बीते साल हुई वृद्धि पिछले दस सालों में हुई औसत वृद्धि से 50 फीसद ज्यादा थी। इंसानी गतिविधियों और अल-नीनो की वजह से हुई इस वृद्धि ने बीते आठ लाख सालों का रिकार्ड तोड़ दिया है। वर्ष 2015 में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा औसत 400 पीपीएम थी, लेकिन 2016 में यह बढकर औसत 403.3 पीपीएम हो गई। इससे पहले सबसे ज्यादा बढ़त 1997-1998 में अल-नीनो के दौरान हुई थी। तब यह 2.7 पीपीएम थी जबकि इस बार 3.3 पीपीएम है। यह भी बीते दस वर्षों के औसत से 50 प्रतिशत ज्यादा था।

अल-नीनो वातावरण में कार्बन की मात्रा पर असर डालता है क्योंकि इसके चलते सूखा पड़ने से पेड़ों की कार्बन सोखने की क्षमता प्रभावित होती है। बीते सत्तर सालों में वातावरण में कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि शीत युग के अंत से 100 गुना ज्यादा है। वर्ष 1990 से विकिरण में कुल 40 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई जिससे वातावरण की सभी ग्रीनहाउस गैसों पर असर पड़ा है। भू-वैज्ञानिक रूप से यह वृद्धि वातावरण में गर्मी के अत्यंत बढ़ने जैसी है क्योंकि ये परिवर्तन सामने आने में पहले की तरह 10 हजार साल नहीं लगेंगे। ये परिवर्तन जल्दी दिखाई देंगे।

दुनिया को नहीं पता कि हालत क्या है, इस वजह से यह स्थिति चिंताजनक है।
अतीत में ऐसी ही स्थिति पचास लाख साल पहले सामने आई थी। तब दुनिया का तापमान दो से तीन सेल्सियस था और समुद्र का जलस्तर ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिक के ग्लेशियर पिघलने के कारण 10 से 20 मीटर ज्यादा था। हमें तत्काल प्रभाव से पेरिस समझौते पर काम करना चाहिए और जीवाश्म र्इंधन से दूरी बनानी चाहिए। भयावह स्थिति के संकेत नजर आ रहे हैं। हमारे पास इस चुनौती से निपटने के कई उपाय हैं। बस वैश्विक राजनेताओं को दृढ़ इच्छाशक्ति और इस मसले को महत्त्व दिए जाने की जरूरत है। आज अगर इस पर ध्यान नहीं दिया तो भविष्य में होने वाले विनाश के लिए सिर्फ और सिर्फ वर्तमान मानव पीढ़ी उत्तरदायी होगी।
’विपिन डागर, चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ

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