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राजनीतिः घोषणा के बावजूद

वित्तमंत्री ने 2018-19 के बजट भाषण की शुरुआत में ही चौंकाने वाली घोषणा की थी कि किसानों को उनकी उपज का डेढ़ गुना दाम दिया जाएगा।

Author February 7, 2018 4:52 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

वित्तमंत्री ने 2018-19 के बजट भाषण की शुरुआत में ही चौंकाने वाली घोषणा की थी कि किसानों को उनकी उपज का डेढ़ गुना दाम दिया जाएगा। इससे भी अधिक चौंकाने वाली घोषणा यह थी कि डॉ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित कृषि आयोग (2004-06) की सिफारिशों के अनुसार रबी की अधिकांश फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत से कम से कम डेढ़ गुना पूर्व में ही तय कर लिया गया है और आगामी खरीफ की फसल में भी अधिघोषित फसलों का दाम लागत मूल्य का डेढ़ गुना करने का फैसला लिया गया है। इसका अर्थ हुआ कि वर्षों से किसान जो मांग रहे थे, वह एक झटके में उन्हें मिल गया। लेकिन इस खुशी में कई किंतु-परंतु हैं।

योगेंद्र यादव जैसे किसान नेता, जो किसानों को उनकी उपज की लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिलाने के लिए संघर्षरत हैं, का दावा है कि वित्तमंत्री ने उपज का लागत मूल्य तय करने में कलाबाजी की है। उनके अनुसार वित्तमंत्री ने लागत पर डेढ़ गुना दाम देने के लिए अपनी सहूलियत के हिसाब से कम लागत को चुन लिया। फसलों के दाम की सिफारिश करने वाली संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) दो तरह की लागत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की सिफारिश करती है। इसमें एक है कुल लागत। इसमें फसल उत्पादन पर आई असल लागत के साथ-साथ कृषक परिवार के श्रम, जमीन का किराया और पूंजी पर ब्याज को भी शामिल किया जाता है। किसान इसी लागत पर डेढ़ गुना दाम की मांग कर रहे हैं।

वित्तमंत्री ने जो डेढ़ गुना मूल्य देने का प्रस्ताव किया है वह तय फार्मूले से निर्धारित मूल्य नहीं है। योगेंद्र यादव का कहना है कि इस फार्मूले से तो मूल्य पहले ही मिल रहा है, बल्कि एमएसपी इससे ज्यादा भी होता है। लेकिन यह दाम कुल लागत मूल्य से बहुत कम है, और किसान उसी के लिए आंदोलन और संघर्ष कर रहे हैं। इस विश्लेषण के आधार पर वित्तमंत्री की घोषणा के बावजूद न तो किसान संतुष्ट होंगे और न उनके आंदोलन थमेंगे। बल्कि किसान स्वयं को ठगा हुआ महसूस करेंगे।
’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

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