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चौपालः जात न पूछो

भारत एक बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक अस्मिताओं वाला बहुलतावादी समाज है।

Author January 18, 2018 2:56 AM
(by Subrata Dhar)

भारत एक बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक अस्मिताओं वाला बहुलतावादी समाज है। अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस जैसे महान देशों में, जहां प्रजातांत्रिक व्यवस्था जाति-वर्ग विशेष के साथ भेदभाव से शुरू हुई वहीं भारत में इसकी शुरुआत सबको बराबर मानने वाले संवैधानिक उपचारों से हुई। यही कारण है कि दो जातिगत और सांप्रदायिक समूहों के बीच वैमनस्य फैलाने वाले विचारों को यहां का कानून आपराधिक घोषित करता है। भारत के कम पढ़े-लिखे और अपनी मान्यताओं में जीने वाले लोग भी आमतौर पर ऐसे विचारों के साथ खड़े नहीं होते। मगर एक वैमनस्य ऐसा है जो पढ़े-लिखे और शिक्षित-संभ्रांत कहे जाने वाले लोगों द्वारा रात-दिन फैलाया जा रहा है, मंचों से कहा जा रहा है, संगोष्ठियों में बोला जा रहा है, किताबों में लिखा जा रहा है और अकादमिक जगत में भी बेरोक-टोक इसका चलन है।

यह वैमनस्य है ‘ब्राह्मणवाद‘ शब्द का प्रयोग। इसका इस्तेमाल तमाम जगह भारत के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक भेदभाव और छुआछूत को इंगित करने के लिए किया जा रहा है। हर बुराई के पीछे इसी ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इस बात को भूल कर कि यह खलनायकी वाद एक खास जाति के नाम से जुड़ा है। भारत में रहने वाली अन्य जातियों की तरह ‘ब्राह्मण’ भी एक जाति है जो भारतीय संविधान के तहत बने देश में बिना किसी विशेषाधिकार के जी रही है, ऐसे में वह यह गाली क्यों सुने! जो शब्द और शब्दावली समता पर आधारित लोकतंत्र में एक जाति विशेष को चोटिल करती हो क्या ऐसे शब्द का प्रयोग आपराधिक नहीं होना चाहिए? ऐसे प्रश्न उठाने पर इनका प्रयोग करने वाले लोग कहते हैं कि ब्राह्मणवाद को ‘ब्राह्मण’ से नहीं जोड़ा जाना चाहिए; इस शब्द का प्रयोग शोषण दिखाने के लिए होता है, एक जाति के खिलाफ नहीं। प्रश्न है कि कोई सामान्य आदमी ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण से कैसे अलगाएगा?

यह एक तथ्य है कि ब्राह्मण जाति की स्थिति हिंदू-धर्म के अभिभावक की रही है। मगर क्या यह स्थिति सभी ब्राह्मणों की थी? अन्य वर्गों की तरह इसमें भी गरीबी, बीमारी और भुखमरी में जीने वाले लोग थे। मुट्ठी भर लोग ही पुरोहित होते थे और उनमें सभी गलत हों यह जरूरी नहीं। उनमें से चुनिंदा लोग ही ऐसे रहे होंगे जिनके मत्थे भेद-भावकारी व्यवस्था बनाने की बुराइयों को मढ़ा जा सकता है। जो बुरे थे वे आज नहीं हैं और न ही उनकी बनाई व्यवस्था ही रह गई है। तो किसी बाबर की गलती की सजा किसी जुम्मन को क्यों दी जाए!
आज ‘एक व्यक्ति एक मत’ के सिद्घांत के समय में ब्राह्मण जाति विशेष कहला कर मानसिक तौर पर प्रताड़ित क्यों हो? धर्म के नाम पर आम जनता का शोषण-उत्पीड़न करने वाले संत रामपाल, राम रहीम और आशाराम जैसे लोग किस जाति से हैं? जिस किसी जाति से हों, मगर ब्राह्मण तो कतई नहीं हैं, यह तय है। तो धार्मिक अधिनायक ब्राह्मण को ही क्यों कहा जाए! जबकि वह भी कानून को मानता है, अपराध में दंडित होता है, बेरोजगारी में नौकरी की भागदौड़ करता है और शोषण का शिकार भी होता है, तब उसे चुभने वाले शब्द क्यों सुनने चाहिए!

हम सबको विचार करने की जरूरत है, आज जब हम हाशिये पर रहे लोगों को उल्लेखनीय रूप से ऊपर उठा रहे हैं, पीएसएलवी लांच हो रहे हैं और आदमी आगे की ओर बढ़ रहा है तब ठीक उसी समय क्यों हम पीछे जा रहे हैं? कोई भी समाज अपने अतीत से सीखता है मगर भूत के घाव को कुरेद कर कोई भी देश या समाज आगे नहीं बढ़ सका है। ऐसी सोच तो देश के मुसलमानों और एंग्लो इंडियन समुदाय को भी निशाने पर ले सकती है क्योंकि लंबे समय तक उनका राज रहा है और अपनी सत्ता के संरक्षण में उनकी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक हैसियत अगड़ी रही है। तो क्या उन समुदायों को भी अपशब्द कहें, उनसे हर्जाना वसूलना चाहिए? आज हमें सोचना है कि समाज हित और संविधान हित में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द एक दिन भी नहीं चलना चाहिए, इस पर प्रतिबंध होना चाहिए।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ल

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