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चौपालः शिक्षा की फिक्र

शिक्षा पर केंद्रित लेख ‘क्यों बंद हो रहे हैं सरकारी स्कूल’ (26 दिसंबर) में कौशलेंद्र प्रपन्न ने बहुत बुनियादी सवाल भारतीय समाज के पटल पर रखा है।

Author December 28, 2017 3:17 AM

शिक्षा पर केंद्रित लेख ‘क्यों बंद हो रहे हैं सरकारी स्कूल’ (26 दिसंबर) में कौशलेंद्र प्रपन्न ने बहुत बुनियादी सवाल भारतीय समाज के पटल पर रखा है। कहा जाता है कि शिक्षा किसी भी समाज के विकास का मुख्य आधार होती है, लेकिन भारतीय शासन और सत्ता तंत्र सालों से इस अवधारणा के विरुद्ध काम करता आ रहा है। देश में निजी पूंजी का दैत्य तमाम सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधाओं को विकास के नाम पर निगलता जा रहा है। लगता है सरकारी तंत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मूलभूत क्षेत्रों को देशी-विदेशी पूंजी घरानों को बेचने पर उतारू है। हाल ही में दिल्ली और गुरुग्राम के महंगे सुपर स्पेशियॉलिटी निजी अस्पतालों की कारगुजारियां हमारे सामने हैं।

दूसरी तरफ, हाल ही में जारी वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट 2017-18 बता रही है कि भारत में लगभग नौ करोड़ बच्चे आज स्कूली शिक्षा से बाहर हैं। इनके बाहर रहने के प्रमुख कारणों में वित्तीय और ढांचागत संसाधनों की कमी, धार्मिक, जातिगत और सामंती सोच की जड़ता है। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इससे बड़ा आंकड़ा उन बच्चों का है जो निरंतर ‘ड्रॉप आउट’ हो रहे हैं, यानी बीच में ही स्कूली पढ़ाई छोड़ रहे हैं। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले पांच साल में बच्चे कम होने का बहाना बना कर डेढ़ लाख सरकारी स्कूलों पर ताला जड़ दिया गया है। देश में इससे बड़ा भ्रष्टाचार और कोई नहीं हो सकता।

क्या कोई यह बताएगा कि सरकार ने इतने समय में कितने नए सरकारी स्कूल खोले हैं? हमारी जनसंख्या तो हर पल बढ़ रही है और इस लिहाज से हमें और ज्यादा स्कूलों की जरूरत है। लेकिन हमारे स्वयंभू नेताओं ने हाल ही में चौदह हजार सरकारी स्कूल राजस्थान में बंद कर दिए और हजारों स्कूलों का संचालन निजी पूंजी को सौंप दिया है! एक तरफ तो हम शिक्षा अधिकार कानून 2009 देश भर में लागू करने का दावा कर रहे हैं कि 6-14 की उम्र के हरेक बच्चे को निशुल्क शिक्षा पाने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन दूसरी तरफ हम सरकारी स्कूलों में ताला लगाते जा रहे हैं और ‘पीपीपी’ यानी सार्वजनिक-निजी भागीदारी के नाम पर निजी पूंजीपतियों को बेचते जा रहे हैं।

सरकार की यह दोमुंही ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाली चाल मानव हित में कैसे सही हो सकती है? एक तरफ भारतीय मानस गुणवत्तापूर्ण, व्यावहारिक और एक समान शिक्षा पद्धति की मांग कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ शिक्षा किसी भी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं है। आखिर क्यों शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दे गाय, आतंकवाद, लव जिहाद, राम मंदिर की तरह घर, गली, नुक्कड़, चाय की दुकानों, अखबारों और टीवी चैनलों की चौबीसों घंटे चलने वाली बहसों का हिस्सा क्यों नहीं बन पा रहे हैं? आखिर कौन, किससे और कब ये सवाल उठाएगा? क्या देश के हरेक नागरिक को यह नहीं समझना चाहिए कि आज देश किस ओर जा रहा है और हम व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर उसमें क्या भूमिका निभा रहे हैं! देश का बच्चा यह तो जानता है कि ‘बाहुबली’ को किसने मारा, लेकिन क्या कारण है कि देश में आज तक यह कोई नहीं जान पाया कि गौरी लंकेश, एमएम कलबुर्गी, गोविंद पानसरे, अखलाक, नजीब आदि को किसने मारा! आखिर लोग कब तक भ्रम की दुनिया में चुप बैठे रहेंगे?
’मुकेश कुमार, द्वारका, दिल्ली

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