ताज़ा खबर
 

चौपाल: राजनीति की जगह

सुदृढ़ और सक्षम राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना को साकार सिद्ध करने के लिए नागरिकों की राजनीति के प्रति जागृति, एक प्रकार से एक अनिवार्य शर्त होती है।

Monsoon Session of Parliamentभारत की संसद भवन। (पीटीआई)

लोकतंत्र में लोकतंत्र की सार्थकता के लिए नागरिकों का राजनीति के प्रति पूर्ण रूप से जागृत होना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन वर्तमान सामाजिक परिवेश में आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग आमतौर पर राजनीति से परहेज किया करता है। व्यावहारिक रूप से राजनीति के प्रति अपनी अभिरुचि प्रदर्शित करने वाला वर्ग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीति पर निर्भर रहता है।

यह निर्भरता व्यावसायिक प्रकृति के चलते भी होती है और दल या व्यक्ति विशेष के प्रबल पक्षधर के रूप में भी होती है। सुदृढ़ और सक्षम राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना को साकार सिद्ध करने के लिए नागरिकों की राजनीति के प्रति जागृति, एक प्रकार से एक अनिवार्य शर्त होती है। लोकतंत्र में आम नागरिकों का विरक्ति भाव लोकतंत्र के भविष्य की दृष्टि से बहुत बेहतर नहीं माना जा सकता। बल्कि यह लोकतंत्र पर संकट का भी कारण बन सकता है।

वास्तव में आम नागरिकों में राजनीति के प्रति गहरे रुझान के भाव जागृत करना आवश्यक है। राष्ट्र की सर्वांगीण समृद्धि के मूल में नागरिकों की शारीरिक एवं मानसिक श्रम शक्ति का अहम योगदान होता है। यह योगदान प्रत्यक्ष रूप से तो नागरिकों की ओर से नागरिकों के लिए ही होता है, लेकिन प्रकारांतर से यह राष्ट्र की समृद्धि का कारक भी होता है।

दरअसल, ऐसे ही भाव नागरिकों के अंतर्मन में जागृत होना नागरिकों में राष्ट्रवादी भावना की अनुभूति का भी कारक होता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि नागरिकों को यह एहसास कराया जाए कि राष्ट्र की समृद्धि में ही उनकी समृद्धि है और उनकी समृद्धि ही राष्ट्र की समृद्धि है। वास्तव में नागरिक जितने अपने अधिकारों के प्रति जागृत होते हैं, उन्हें उतने ही अधिक निष्ठा के साथ राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के परिपालन के प्रति भी प्रतिबद्ध होते हैं।

आमतौर पर यह देखा गया है कि कामकाजी वर्ग राजनीति के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं दिखाता है। कमाने और खाने खिलाने के सिलसिले में इनकी व्यस्तता दीन-दुनिया से ताल्लुक रखने का अवसर नहीं देती। काम और आराम तथा शेष समय परिवार के नाम। बस इनकी यही तक सिमटी हुई जिंदगी होती है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में क्या कुछ चल रहा है, समाज और देश की सांस्कृतिक उपलब्धियां कौन-कौन से कीर्तिमान दर्ज कर रही है, आदि तमाम बातों से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

इस वर्ग को प्रकारांतर से हम अंतमुर्खी आत्म-स्वभाव वाले वर्ग के रूप में भी संबोधित कर सकते हैं। इतना जरूर है कि यह समाज और राजनीति के लिए कभी आक्रामक नहीं होते। लेकिन इन पर यह आक्षेप तो लगाया ही जा सकता है कि यह वर्ग यथास्थितिवाद का पोषक सिद्ध होता रहा है। प्रत्यक्ष नहीं, लेकिन परोक्ष रूप से तो यह वर्ग अपनों के बीच अपने लिए ही जीता है।
’राजेंद्र बज, हाटपीपल्या, देवास, मप्र

Next Stories
1 चौपालः असुरक्षित बेटियां
2 चौपालः जीवन के मूल्य
3 चौपालः विकल्प की समस्या
ये पढ़ा क्या?
X