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चौपाल: पढ़ाई की चिंता

जब कोरोना का टीका नहीं आया था तब दुनिया बेचैन थी। अब जब आ गया है तो पहले मैं की लड़ाई शुरू हो चुकी है। जिसका डर था, वही सामने आने लगा है। टीका राष्ट्रवाद अपने चरम पर पहुंच गया है।

Author Updated: February 1, 2021 8:20 AM
Coronavirusकोरोना की दो डोज, संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी है। सोमवार को जम्मू में वैक्सीन की दो शीशियां दिखाता हुए एक स्वास्थ्य कर्मचारी। (फोटोः पीटीआई)

कोरोना महामारी के कारण शैक्षणिक सत्र के रूप में एक साल बर्बाद हो चुका है। पढ़ाई अभ्यास मांगती है। अगर अभ्यास न किया जाए तो वह स्मृति से मिटेगी ही। ऐसे में शिक्षकों और शिक्षाविदों के लिए एक चुनौती है कि बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था को पटरी पर कैसे लाया जाए। जरूरत को देखते हुए आॅनलाइन शिक्षा से काम चलाया गया, लेकिन यह एक अस्थायी विकल्प से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो रहा। इसकी सबसे बड़ी खामी यह रही कि अधिकांश बच्चे तो आॅनलाइन पढ़ाई के दायरे में आ ही नहीं सके। ऐसे में पाठ्यक्रम कैसे पूरा हो, यह चिंता की बात है।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर

टीका और राष्ट्रवाद

जब कोरोना का टीका नहीं आया था तब दुनिया बेचैन थी। अब जब आ गया है तो पहले मैं की लड़ाई शुरू हो चुकी है। जिसका डर था, वही सामने आने लगा है। टीका राष्ट्रवाद अपने चरम पर पहुंच गया है। हर देश पहले खुद पर ध्यान देने पर तुला है। मसलन यूरोपियन संघ ने अपने सत्ताईस सदस्य राष्ट्रों के अंदर जहां-जहां टीका निर्माण के कारखाने हैं, को आदेश दे दिया गया है कि वे अपने टीके यूरोपीय संघ के बाहर निर्यात नहीं करें। यूरोपीय संघ के इस कदम की विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भर्त्सना की है।

इस तरह से तो महामारी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई कभी जीती ही नहीं जा सकेगी। जबकि भारत जैसे देश ने कई देशों को अपने टीके निर्यात किए हैं। यह मानवता से जुड़ा मसला है। होना ये चाहिए था कि जिन देशों में कोरोना मामले ज्यादा हैं, उन्हें तरजीह देनी चाहिए थी। क्योंकि जितनी कंपनियां टीकों का निर्माण कर रही हैं, किसी ने भी इस टीके का असर एक वर्ष से ज्यादा नहीं बताया है। मतलब अमेरिका जैसे देश में भी संपूर्ण टीकाकरण में एक वर्ष से ज्यादा समय लगेगा। मतलब जिसने शुरू में टिका लिया था, उसे लगाने की पारी फिर आ जाएगी। इस तरह विकासशील देशों को तो टीका मिलते-मिलते लंबा समय लग जाएगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

पॉलिथीन पर पाबंदी जरूरी

सरकार द्वारा पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी बाजारों में पॉलिथीन थैलियों के प्रचलन में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि इसका इस्तेमाल बढ़ता ही जा रहा है। सवाल तो यह है कि जब यह प्रतिबंधित वस्तु है तो बाजारों में पहुंच कैसे रही है? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब सब मांगते हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन के पास इसका कोई जवाब नहीं है।

सरकारी निदेर्शों के वाबजूद इन थैलियों का बाजार में खुलेआम इस्तेमाल यह प्रमाणित करता है कि सरकार का तंत्र कमजोर और भ्रष्ट हो चुका है और वह अपने फैसलों को लागू करवाने में अपने को लाचार पा रहा है। यही कारण है कि लोगों में भी सरकारी तंत्र का भय पूरी तरह से खत्म हो चुका है। सब जानते हैं कि पॉलीथिन का इस्तेमाल पर्यावरण के लिए बहुत ही खतरनाक है। यह नष्ट भी आसानी से नहीं होता। पशुओं के पेट से पॉलीथिन की थैलियां निकलने की घटनाएं हम सुनते ही रहते हैं। इससे जल भी प्रदूषित होता है। इसलिए पर्यावरण को संरक्षित एवं सुरक्षित बनाने के लिए पॉलिथीन के प्रयोग पर प्रभावी प्रयास की जरूरत है।
’डा. अशोक, पटना

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