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चौपालः संगदिल संगबाज

यह कैसी संगदिली है कि परायों की शह पर वे अपनों पर ही संग (पत्थर) बरसा रहे हैं!

Author Published on: April 15, 2017 4:16 AM
जम्मू-कश्मीर में स्थानीय युवकों द्वारा चुनावी ड्यूटी में लगे CRPF जवानों की पिटाई का विडियो वायरल होने के बाद उमर अब्दुल्ला ने कुछ तस्वीरें और विडियो ट्विटर पर शेयर किए हैं

यह कैसी संगदिली है कि परायों की शह पर वे अपनों पर ही संग (पत्थर) बरसा रहे हैं! न केवल संग बरसा रहे हैं बल्कि ऐसा करके देश की छवि को आहत कर ‘रोजगार’ कमा रहे हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि वे यह क्या कर रहे हैं! यह भी नहीं मालूम उन्हें कि वे क्या थे और ऐसा करते हुए अब क्या से क्या हो गए हैं! अपने ही मुल्क के बाशिंदोंं पर संग की बरसात करना मुल्क के साथ अहसान-फरामोशी नहीं तो और क्या है! कोई उन्हें समझाए भी कैसे? वे समझ का एक भ्रमित अकाल जो भोग रहे हैं। अपने भटकाव की भूल-भुलैया के चलते वे अब-तक अपने वजूद को कभी पहचान ही नहीं सके हैं। उससे भी ज्यादा दुखद बात है कि वे अपना वजूद पहचानने को आतुर भी नहीं रहे।

इसमें उनका कोई दोष नहीं। दोष उनके उन रहनुमाओं का है जिन्होंने कभी उन्हें अपनी अक्ल से बड़ा ही नहीं होने दिया। उन्हें हमेशा पितृ-सत्तात्मक आकांक्षाओं के चलते अपने ही मुल्क के खिलाफ लड़ाका बनाकर रखा। चंद मुल्क-फरामोश उन्हें दशकों से दिग्भ्रमित कर रहे हैं। उनके हाथों में कुरान-कंप्यूटर की जगह आत्मघाती हथियार थमा रहे हैं। ऐसा करके वे एक जिंदा कौम को अपनी ही बनाई कब्रगाह में झोंक रहे हैं। उन्हें एक अनैतिक संघर्ष की बलि-वेदी पर चढ़ा रहे हैं।

अक्सर ये लोग उस मुल्क के पैरोकार बन कर कश्मीर के युवाओं को भटकाते रहे हैं, जिस मुल्क को खुद की पहचान तक का इल्म नहीं है। वह मुल्क जो संपूर्ण भारत की कोख का जाया होकर भी न तो अब तक एक शानबाज मुल्क की पहचान पा सका है और न एक मुसलिम राष्ट्र के रूप में अपनी कोई सम्मानजनक पहचान बना सका है। एक ऐसा दया योग्य राष्ट्र जो अपनी ही बिरादरी के अभिजात मुसलिम राष्ट्रों में क्षुद्र और हेय समझा जाता है और गैर मुसलिम राष्ट्रों में एक धोखेबाज आतंकी राष्ट्र। ऐसे गैर-पहचान वाले गैर-जिम्मेदार राष्ट्र से प्रेरित होकर हुए कुछ भटके हुए नौजवानों के हाथों में संग नहीं तो भला और क्या होने की उम्मीद की जा सकती है!

भारत से इतर आज कश्मीर की पृथक पहचान क्या है? यह बात वहां के संगबाज नौजवानों को समझनी ही चाहिए। पाकपरस्त आतंकवाद कभी उसका रहनुमा नहीं हो सकता। आज नहीं तो कल, उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटना ही होगा। अपनी पहचान के संकट को खत्म करना ही होगा। अपनी बुद्धि के अकाल से पार पाना ही होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि कश्मीर का नौजवान अपनी भ्रमित वस्तु-स्थिति का आत्म-साक्षात्कार आज नहीं तो कल करेगा ही। ऐसे में नौजवानों को यह गुंजाइश अवश्य रखनी चाहिए कि कल उन्हें अपने कृत्यों पर यह सोचकर शर्मिंदगी न हो कि उन्होंने अपने ही देशवासियों पर बे-मुरव्वत होकर नाहक ही संग बरसाए थे। भारत तो आज भी यह सोचकर उनका इस्तकबाल करने को आतुर है कि- ‘ये मोज्जां भी मोहब्बत कभी दिखाए हमें../ कि संग तुझ पे गिरे और जख्म आये मुझे !’
’राजेश सेन, अंबिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर

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