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न्याय में बाधा

हर बार सत्ता बदलने पर पूर्व में हुई ज्यादती का खमियाजा पुलिस को ही भुगतना पड़ता है

न्याय में बाधा
प्रतीकात्मक तस्वीर। (Photo Credit – Express Photo/Vishal Srivastav)

सामान्यतया सत्ता के दबाव में पुलिस विपक्ष को कमजोर करने हेतु निरपराध के खिलाफ भी सीमा तोड़ कर कार्रवाई करती है। इसलिए हर बार सत्ता बदलने पर पूर्व में हुई ज्यादती का खमियाजा पुलिस को ही भुगतना पड़ता है और सत्ताच्युत लोग बाहर होते ही मुंह फेर लेते हैं। इसलिए सत्ताधारी और पुलिस दोनों को ही किसी के साथ ज्यादती में अति न करें, क्योंकि इसे कोर्ट सहन नहीं करती।

न्यायिक कदम उठते देख सत्तारुढ़ लोग मामलों को वापस ले लेते या कमजोर करने हेतु पुन: पुलिस का ही सहारा लेते हैं। अंततोगत्वा खिंचाई पुलिस की होने तथा मामलों की संख्या बढ़ने से न्यायालयों के कई महत्त्वपूर्ण मामले बाधित और लंबित हो जाते हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का भी ऐसे मामलों को सुनने में समय जाया होता है और कोर्ट भी निर्णय देने के बजाय फटकार लगाकर इतिश्री कर लेती है।
बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, उज्जैन

बाढ़ और सुखाड़

आज देश के आधे हिस्से में बाढ़ है, तो आधे हिस्से में सुखाड़। बाढ़ और सुखाड़ दोनों की स्थिति देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन विगत कुछ दशकों से मानव की गतिविधियां बाढ़ के लिए अधिक जिम्मेदार हैं। असम, गुजरात और महाराष्ट्र में बाढ़ से भारी तबाही देखी जा रही है।

विकास के नाम पर नदियों में अनगिनत बांध बनाए गए हैं। बांध के सहारे पानी को एकत्रित कर दूसरे क्षेत्रों में प्रवाहित किया जाता और नदियों की धारा को मोड़ दिया जाता है। नदियों की अपनी एक दिशा होती है। अगर हम उनके मार्ग बदलने का प्रयास करेंगे, तो बाढ़ के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। बांध की वजह से नदियों में गाद की समस्या बढ़ रही है, और भ्रष्टाचार की वजह से गाद की सफाई सिर्फ कागजों पर हो रही है। नदियों के मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ करना मानव को महंगा साबित हो रहा है। मानसून के दिनों में बारिश की हर बूंद को धरती के गर्भ तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए, तभी हम जल संकट की समस्या का निदान कर पाएंगे।
हिमांशु शेखर, गया

महंगाई पर आक्रोश

केंद्र सरकार अच्छे दिन के सपने दिखा कर लोगों को उल्लू बनाती रही। कभी रोजगार के वादे, कालेधन की वापसी आदि लोकलुभावन बातें करती रही, लेकिन अब जनता का धैर्य टूटता जा रहा है। लोग चारों तरफ सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने लगे हैं। आजादी के बाद पहली बार खाद्यान्न पर कर लगाया गया है। सरकार जनसरोकार के मुद्दे से भटक गई और सिर्फ कारपोरेट घरानों की यार बन कर रह गई है।

नतीजा, आम आदमी सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण पिस रहा है। समाजवादियों ने कहा था कि जब संसद आवारा बन जाए तो आम अवाम को सड़कों पर उतरना चाहिए।आरबीआई की निरंतर कोशिश रहती है कि देश में खुदरा महंगाई दर छह प्रतिशत से ऊपर न जाए, लेकिन यह लगातार चौथा महीना है जब महंगाई दर इस स्तर से ऊपर रही है। मार्च में महंगाई 6.95 प्रतिशत थी। पिछले साल की तुलना में देखें तो यह बड़ा उछाल है।

अप्रैल 2021 में महंगाई दर 4.23 प्रतिशत थी। इस बार महंगाई दर के इतना ऊपर जाने में बड़ी भूमिका खाने-पीने की चीजों के दामों की है। लगभग हर चीज के दाम में उछाल आया है। खाने के तेल के दाम एक महीने में 17.28 प्रतिशत बढ़ गए, सब्जियों के दाम 15.41 प्रतिशत बढ़ गए, मसालों के दाम 10.56 प्रतिशत बढ़ गए और मांस-मछली के दाम 6.97 प्रतिशत बढ़ गए हैं। पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और रसोई गैस के दाम भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

कपड़ों और जूते-चप्पलों के दाम भी 9.85 प्रतिशत बढ़ गए हैं। फलों के दाम 4.99 प्रतिशत बढ़ गए हैं। स्वास्थ्य से जुड़ी चीजों के दाम 7.21 प्रतिशत बढ़ गए और यातायात और संचार से जुड़ी चीजों के दाम 10.91 प्रतिशत बढ़ गए। महंगाई इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। भाजपा शासन में महंगाई चरम पर पहुंच गई है। आम जनता महंगाई से बेहाल है। मगर सरकार शासन सुख भोगने में लगी हुई है। महंगाई के इस दौर में घर बनाना तो एक सपना हो गया है।
प्रसिद्ध यादव, पटना

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