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चौपालः शिक्षा से वंचित

हर विद्यार्थी को अपनी योग्यता, आर्थिक-सामाजिक परिस्थिति और शिक्षण संस्थान की भौगोलिक निकटता के मुताबिक अपनी इच्छानुसार कहीं भी शिक्षा ग्रहण करने पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।

Author April 10, 2018 02:56 am
प्रतीकात्मक चित्र

हमारे देश में विद्यार्थी के शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार को किसी भौतिक सीमा में नहीं बांध जा सकता। हर विद्यार्थी को अपनी योग्यता, आर्थिक-सामाजिक परिस्थिति और शिक्षण संस्थान की भौगोलिक निकटता के मुताबिक अपनी इच्छानुसार कहीं भी शिक्षा ग्रहण करने पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। सक्षम व संभ्रांत वर्ग से संबंध रखने वाले विद्यार्थियों को इस आजादी का भरपूर उपयोग करते देखा जाता है पर देश के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां इस प्रकार की बातें व्यर्थ ही नजर आती हैं। विभिन्न राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों के विषय में अक्सर देखा जाता है कि एक राज्य के विद्यार्थी को सीमा पार पड़ोसी राज्य में कुछ ही दूरी पर स्थित शासकीय शिक्षण संस्थान में केवल इसलिए प्रवेश नहीं मिल पाता कि वह संबंधित राज्य का मूल निवास नहीं है। ऐसे जब उस विद्यार्थी का अपने राज्य में निकटतम शिक्षण संस्थान मीलों दूर हो, पड़ोसी राज्य में उसके निवास का प्रमाण पत्र मांगा जाता है जो जाहिर है उसके पास होता नहीं। इस तरह पढ़ने का इच्छुक विद्यार्थी शिक्षा से वंचित रह जाता है।

विडंबना है कि यह स्थिति पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले देश के सबसे पिछड़े माने जाने वाले आदिवासी बहुल क्षेत्रों में देखी जाती है। इनमें ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड के सीमावर्ती इलाके विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विशेष रूप से देखा जा रहा है कि घर से पास लेकिन सीमा पार स्थिति महाविद्यालय में प्रवेश लेने गए विद्यार्थी से निवास और जाति से लेकर अन्य विभिन्न प्रकार के दस्तावेज मांगे जाते हैं। अपने राज्य का निवास नहीं पाए जाने पर उन्हें प्रवेश से वंचित कर दिया जाता है। ये आदिवासी बच्चे अपने प्रदेश में बहुत दूर स्थित महाविद्यालयों तक विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारणों से पहुंच नहीं पाते और शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

इस समस्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करने की जरूरत है। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय से नीतिगत बदलाव करते हुए नई कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए ताकि अधिक से अधिक विद्यार्थी बिना औपचारिकताओं के कहीं भी शिक्षा ग्रहण कर सकें। आज हर जगह ‘आधार’ पहचान का एक बेहतर जरिया बन चुका है। ऐसे में आधार के ब्योरे को विद्यार्थी के प्रवेश के लिए पर्याप्त मानने पर विचार किया जा सकता है।

ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़

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