जिंदगी की सेहत

आज ज्यादातर लोगों को पैसा कमाने और उसके लिए काम करने की वजह से जिंदगी घड़ी की सूइयों की तरह तेजी से घूमने लगी है।

सांकेतिक फोटो।

आज ज्यादातर लोगों को पैसा कमाने और उसके लिए काम करने की वजह से जिंदगी घड़ी की सूइयों की तरह तेजी से घूमने लगी है। इन दबावों के चलते लोगों के रहन-सहन और जीवनशैली में आमूल परिवर्तन आ गया है। जीवनशैली मे परिवर्तन और खानपान की गलत आदतों के कारण अनेक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। बीमारियों के बढ़ने के लिए न कोई संक्रमण का दोष होता है और न ही कोई आनुवांशिक कारण। शारीरिक सक्रियता की कमी, कार्य के दबाव से तनाव के बढ़ते स्तर, डिब्बाबंद तुरंता खाद्य पदार्थ का अधिक उपयोग, आधुनिक तकनीकी का निरंतर प्रयोग और पर्याप्त नींद के न होने से बीमारियों मे बेलगाम वृद्धि हो रही है।

कुछ दशकों पूर्व तक जिन बीमारियों को केवल वयस्कों-वृद्धों की बीमारियां माना जाता था, अब ये युवाओं के साथ-साथ बच्चों को भी अपनी गिरफ्त मे ले रही हैं। निम्न-उच्च रक्त दाब, मधुमेह, कैंसर, अवसाद जैसी बीमारियां, जो पहले यदा-कदा सुनने को मिलती थीं, वे अब बहुत ज्यादा संख्या मे लोगों को होने लगी हैं। इन बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन की अति आवश्यकता है। बदले हुए हालात में हर उम्र के व्यक्ति को पैदल चलने और शारीरिक कसरत करने को नियमित रूप से अपने दैनिक जीवन के जरूरी काम के तौर पर अपनाना होगा। रोजमर्रा के खानपान मे संतुलित और पोषक तत्त्वों को सम्मिलित करना होगा। धूम्रपान और शराब जैसे व्यसनों के सेवन को तिलांजलि देनी होगी। मोबाइल फोन और आधुनिक तकनीकों के उपयोग आवश्यकता के अनुसार ही किए जाएं। ऐसे प्रयास करने होंगे। हम सब अपने कार्यकलापों और आपसी बातचीत में ऐसी कोशिशें करेंं कि तनाव और अवसाद किसी के पास फटक न सके। वैसे हमारे बड़े-बूढ़े सच ही कह गए हैं- जिंदादिली वाली जीवन शैली जिंदगी को खुशहाल बनाने मे सहायक रहती है।
’नरेश कानूनगो, बंगलुरु, कर्नाटक

लालच के बदले

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से लगातार प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, वह कहीं न कहीं हम सबके लिए चिंता का एक विषय है। मनुष्य जिस तरह से लगातार अपने हित और लालच के लिए प्रकृति का दोहन करता जा रहा है, वह एक न एक दिन भयावह और विकराल रूप ले सकता है। आज मनुष्य ने जिस तरह से पर्यावरण के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ा है, उसमें बेमौसमी बरसात, अकाल, सूखा, हिमखंडों का पिघलना, पहाड़ों में भूस्खलन, बाढ़ आना, अतिवृष्टि और ओलावृष्टि आदि शामिल है। गौर करने वाली बात है कि विकास के नाम पर आज जिस तरह से पर्वतीय क्षेत्रों, मसलन उत्तराखंड और हिमाचल में पहाड़ों को काट कर सड़कों का चौड़ीकरण किया जा रहा है, वह अपने आप में एक तरह से पहाड़ों को बर्बाद करने की रूपरेखा तैयार कर रहा है।

इसके अलावा यह भी सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों हम सब यह जानते हुए भी अनदेखा कर देते हैं कि यह इलाके जहां बेहद संवेदनशील पहाड़ है और इस तरह की पर्यावरणीय परिस्थिति इन सबको झेलने में सक्षम नहीं है, तो वहां क्यों हम लगातार इनके साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। उत्तराखंड में 2013 की आपदा से भी हम कुछ नहीं सीख पाए जो अपने आप में प्रकृति की मनुष्य के लिए एक सबसे बड़ी चेतावनी थी। लेकिन इन सबके बावजूद विकास के नाम पर जो मनुष्य का लालच है, वह दर्शाता है कि वह इन घटनाओं की त्रासदी से भी नहीं चेतने वाला। अगर इसी तरह मनुष्य अपने फायदे और लालच के लिए विकास के नाम पर पहाड़ों का या प्रकृति का दोहन करता जाएगा तो निश्चित ही वह दिन दूर नहीं, जब इसका खमियाजा उसे अपने विनाश के साथ चुकाना होगा।
’संदीप रावत, चंडीगढ़

पढें चौपाल समाचार (Chopal News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट