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चौपाल: नशे का जाल

हाल ही में सबने देखा कि पूर्णबंदी के बाद जैसे ही शराब की दुकानें खुलीं, वहां पर शराब पीने वालों की लंबी कतार लग गई।

Author Published on: June 11, 2020 1:47 AM
नशे का कारोबार और खराब होती जिंदगी।

आजकल हमारे देश में नशे का कारोबार बहुत अधिक बढ़ता जा रहा है। जिस युवा पीढ़ी को इस आयु में व्यायाम और खेलों की तरफ ऊंची उड़ान लेनी चाहिए आज वह शराब, सिगरेट, तंबाकू और न जाने विभिन्न प्रकार के कैसे-कैसे नशीले पदार्थों का सेवन कर अपने शरीर को खोखला कर रही है। प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में हमारे देश में नशीले पदार्थों का सेवन करते करते लोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। इसमें कैंसर, हृदय रोग, मस्तिक रोग और न जाने कितनी खतरनाक बीमारियां उनको जकड़ लेती हैं।

नशे की प्रवृत्ति में न केवल युवा वर्ग, बल्कि वृद्ध और उसके साथ-साथ महिलाएं भी शामिल हो रही है। हम पश्चिमी देशों की नकल तो करते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ उस पश्चिमी संस्कृति को अपना कर हम अपने आप को आधुनिक बनाने का प्रयास करते हैं। जितना यह जीवनशैली को लेकर होता है, उतना विचार और ज्ञान के स्तर पर नहीं होता है।

नशे के कारोबार में बड़े-बड़े सौदागर और कई बार जानी-मानी हस्तियां भी शामिल पाई जाती हैं। देर रात तक चलने वाले विभिन्न कार्यक्रमों या अन्य पार्टियों में खुलेआम नशीले पदार्थों का न केवल सेवन होता है, बल्कि कई ऐसे काम होते हैं, जिनका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अगर हम इन सभी बातों पर विशेष रूप से ध्यान दें कि नशे के कारोबार में और इसके सौदागरों से बचाने के लिए अपनी युवा पीढ़ी को शिक्षा से प्रेरित करें, उनके अंदर विभिन्न तरह से उत्साह और उमंग पैदा करें कि आप इन पदार्थों को छोड़ कर एक स्वस्थ जीवनशैली को अपनाएं तो यह बेहद सकारात्मक बदलाव होगा।

हाल ही में सबने देखा कि पूर्णबंदी के बाद जैसे ही शराब की दुकानें खुलीं, वहां पर शराब पीने वालों की लंबी कतार लग गई। जिस आयु में बच्चों को शिक्षा से प्रेरित किया जाए, उस घर में शराब पीने वाले अपने परिवार तथा बच्चों की शिक्षा की तरफ ध्यान न देकर अपनी जमा-पूंजी को भी नशीले पदार्थों के सेवन में लगा देते हैं।

आखिरकार मजदूरी लालन-पालन कर कर महिलाएं अपने घर का खर्चा किसी तरह चलाती हैं और बच्चों का जीवन और पेट पालती हैं। नशे की लत ने न जाने कितने घरों को बर्बाद कर दिया है, लेकिन उसके बाद भी हम नशे से मुंह नहीं मोड़ रहे, बल्कि इसकी तरफ देख रहे हैं।
’विजय कुमार धानिया, नई दिल्ली

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