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चौपालः किसानों का कौन

केंद्र सरकार के हाल के कुछ किसान हितैषी फैसलों को विपक्षी दल राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम ठहरा रहे हैं जबकि अब तक का रिकार्ड बताता है कि किसान उनकी नजरों में महज सियासी लाभ के लिए बलि का बकरा रहे हैं।

Author July 12, 2018 05:29 am
हमारे राजनीतिक दल किसानों की कर्जमाफी की वकालत तो करते हैं, लेकिन कभी उनके द्वार पर सुविधाएं उपलब्ध कराने नहीं पहुंचते।

किसानों का कौन

केंद्र सरकार के हाल के कुछ किसान हितैषी फैसलों को विपक्षी दल राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम ठहरा रहे हैं जबकि अब तक का रिकार्ड बताता है कि किसान उनकी नजरों में महज सियासी लाभ के लिए बलि का बकरा रहे हैं। इन पार्टियों की सोच है कि अगर देश में किसानों की आय बढ़ गई तो उनसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा छिन जाएगा। दरअसल, आज किसानों को कर्जमाफी से ज्यादा फसलों का लाभकारी मूल्य दिलाने की जरूरत है ताकि वे अपनी माली हालत सुधार सकें और आत्महत्या करने पर मजबूर न होना पड़े।

हमारे राजनीतिक दल किसानों की कर्जमाफी की वकालत तो करते हैं, लेकिन कभी उनके द्वार पर सुविधाएं उपलब्ध कराने नहीं पहुंचते। आज भी किसान खून-पसीना बहा कर उगाई गई गन्ने जैसी नकदी फसल चीनी मिल मालिकों को सौंप कर भुगतान की आस में निराश ही नजर आते हैं। खाद, बीज खरीदने और फसलों को बेचने के लिए वे शहरों की ओर ही जाते हैं। किसानों के इस दर्द को वही समझ सकता है जिसने कभी खेतों में खून-पसीना बहा कर फसल उगाई हो और उसका उचित दाम न मिल पाया हो।

पिंटू सक्सेना, दिल्ली

क्रोध-द्वेष रहित

दो केंद्रीय मंत्रियों ने एक अपराध के आरोपियों से जेल के भीतर अथवा दरवाजे पर भेंट की। राहुल गांधी इस पर सख्त गुस्सा हैं और उनका इस्तीफा मांग रहे हैं। मैं याद दिलाना चाहूंगी कि लगभग दस वर्ष पहले उनकी बहन प्रियंका गांधी वेल्लोर कारागार में हत्या और षड्यंत्र की सिद्ध अपराधी नलिनी हरिहरन से गुपचुप मिलने गई थीं। यह बात बाद में एक ‘आरटीआई’ से सामने आई। तब अपनी बहन का समर्थन करते हुए राहुल ने कहा था, ‘हम लोगों के मन में किसी के प्रति गुस्सा या घृणा नहीं है।’ तो क्या इन सात्विक गुणों पर गांधी परिवार का ही एकाधिकार है?

आस्था गर्ग, बागपत रोड, मेरठ

आभासी संसार

सोशल मीडिया आज इस कदर हमारी जिंदगी में शामिल हो गया है कि अब इसके बिना रहना मुश्किल लगता है। यदि दिन में कई दफा वाट्सअप नहीं देखें तो बेचैनी-सी होने लगती है। ऐसा नहीं है कि इसकी गिरफ्त में सिर्फ युवा वर्ग है, बल्कि हर उम्र के लोग इसकी लत के शिकार हैं। इसके दुष्परिणामों को हर आदमी अपनी जिंदगी में जिए जा रहा है। इससे आपसी रिश्तों में दरारें आई हैं। पहले तीज-त्योहारों पर नाते-रिश्तेदारों से गर्मजोशी से मिलते थे। बैठकर गप्पें लड़ाते थे। एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे। मगर आजकल सबकुछ वाट्सअप पर ही हो जाता है। व्यक्ति यह सोच कर खुश होता है कि वह कई सारे समूहों का हिस्सा है या इतने दोस्तों के संपर्क में है। मगर वास्तविकता क्या है यह हम सब जानते हैं। दरअसल वह आभासी दुनिया में जी रहा होता है जिसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है।

प्रेरणा मालवीया, भोपाल

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