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चौपाल: वोट की खातिर

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का काम पूरा हो चुका है। अब टीवी चैनलों पर नतीजों की भविष्यवाणी से लेकर प्रचार के दौरान नेताओं द्वारा किए गए वादों और दिए गए बयानों को लेकर चचार्एं जारी हैं।

bihar exit polls 2020, bihar election 2020बिहार एग्जिट पोल्स के नतीजे जारी हो गए हैं। एनडीए और महागठबंधन में कांटे की टक्कर।

बिहार ऐसा प्रदेश है जहां लोगों की राजनीतिक सोच की जड़ें काफी गहरी हैं। या कहें कि यहां की धरा की तासीर ही ऐसी है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। चाहे युवा हो या उम्रदराज, पुरुष हो या महिला, या फिर युवक-युवती हों, इस रस का आनंद बस सब लेना और देना जानते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का काम पूरा हो चुका है। अब टीवी चैनलों पर नतीजों की भविष्यवाणी से लेकर प्रचार के दौरान नेताओं द्वारा किए गए वादों और दिए गए बयानों को लेकर चचार्एं जारी हैं।

तीसरे और अंतिम चरण के लिए मतदान से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस कथन पर भी चर्चा जोरों पर है जिसमें उन्होंने यहां तक दिया कि यह मेरा अंतिम चुनाव है, अंत भला तो सब भला। हर कोई अब यह पूछ रहा है कि क्या यह भावुकता भरा ध्यान वोट जुटाने के लिए तो नहीं दिया गया। क्या उद्देश्य था इस तरह की बात के पीछे? क्या यह भावुकता भरा वक्तव्य राजनीतिक नाटक था? अंतिम चरण के प्रचार में ही क्यों दिया गया यह बयान? क्या वास्तव में नीतीश राजनीति से संन्यास ले रहे हैं? क्या नीतीश थक चुके हैं?

नीतीश कुमार के इस बयान के बाद विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने का अवसर मिल चुका है। लेकिन चुनाव के दिनों में इस प्रकार के बयान तो अक्सर दिये ही जाते रहे हैं। अब जनता काफी जागरूक हो चुकी है। लोगों को अच्छे-बुरे का ख्याल आ चुका है, वे राजनीति की सभी सियासी चालों से परिचित हैं और हो रहे हैं। इस कारण शिक्षित एवं जागरूक मतदाताओं को अब कोई बरगला नहीं सकता है। अब तो लोग सरकार का कामकाज देख कर ही वोट देते हैं। अब झूठे वादे का कोई मोल नहीं है। अब भावुकता भरे वक्तव्य पर जागरूक मतदाता द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया जाता है। बस काम ही बोलता है।
’अशोक, पटना

पुलिस का संकट
कोरोना महामारी के दौरान देश के डॉक्टर, नर्स, सफाई कर्मचारियों इत्यादि ने तो अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया ही, लेकिन पुलिस वालों का योगदान भी काफी सराहनीय रहा। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी भी इस महामारी का शिकार हुए। लेकिन आज हमारी यह पुलिस हर तरह से संकट में है। इस ओर न तो जनप्रतिनिधियों का ध्यान जाता है, न ही सरकारों का। यदि हम आज पुलिस वालों की आर्थिक स्थिति की बात करें, तो वह कहीं से संतोषजनक नहीं कही जा सकती। उदाहरण के तौर पर मध्य प्रदेश को ही ले लें, जहां पर पुलिस वालों (आरक्षक) के लिए साइकिल भत्ता (1861 से) और पे ग्रेड उन्नीस सौ रुपए ही है जो अपने आप में ही हास्यास्पद है और इसी कारण आज इनकी आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है।

यदि हम पुलिस वालों की मानसिक स्थिति की बात करें तो यह तो और भी दुखद है। इसका मूल कारण है पुलिस वालों के लिए नियमित अवकाश की व्यवस्था आज भी नहीं है। इस कारण इनका पारिवारिक और सामाजिक जीवन लगभग समाप्त-सा हो जाता है। पुलिस पर अपराध नियंत्रण के साथ-साथ कानून-व्यवस्था को बनाए रखने की भी जिम्मेदारी होती है, इससे उस पर काम का दबाव और बढ़ जाता है। इसलिए अब पुलिस के वेतनमान और कामकाज की स्थितियों में सुधार लाने पर विचार होना चाहिए।

कहने के जितने भी पुलिस सुधार आयोग और कमेटियां बनीं, उन सभी ने इस पर खासा जोर दिया, लेकिन विडंबना यह है कि आज तक किसी भी सिफारिश को लागू नहीं किया गया। अगर पुलिस ही संकट में रहेगी तो नागरिकों की सुरक्षा कैसे करेगी?
’सौरव बुंदेला, भोपाल

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