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जड़ का इलाज

निर्भया कांड के नाबालिग आरोपी की रिहाई से उपजी बहस हमें हमारी सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है। सबसे पहले तो किसी नाबालिग का अपराधी बन जाना..

Author नई दिल्ली | Published on: December 23, 2015 2:17 AM
Nirbhaya Gang Rape, 2012 Delhi Gang Rape, Delhi Nirbhaya, Nirbhaya Rape Story, Delhi Gang Rape Real Story, Nirbhaya Gangf Rape Accused, Vinay Sharma, Tihar jail, India News, Jansattaनिर्भया बलात्कार केस में शामिल नाबालिग अपराधी।

निर्भया कांड के नाबालिग आरोपी की रिहाई से उपजी बहस हमें हमारी सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है। सबसे पहले तो किसी नाबालिग का अपराधी बन जाना स्वत:स्फूर्त नहीं होता। इसके पीछे कई पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक कारक होते हैं। इसलिए किसी भी अपराधी, खासतौर पर नाबालिगों को दी जाने वाली सजा को इन कारकों का ध्यान में रख कर उसके जीवन में इसके प्रभाव को न्यूनतम या समाप्त करने का भी प्रयास करना चाहिए।

इसी मंशा से सुधार-गृह और पुनर्वास जैसी कानूनी व्यवस्थाएं की गई हैं। लेकिन क्या ये व्यवस्थाएं निहित लक्ष्य को पाने मे सार्थक सिद्ध हो रहे हैं? कतई नहीं। इसके विपरीत सुधार-गृह में नाबालिग सजायाफ्ता बच्चों के सुधार या पुनर्वास की जगह उनकी प्रताड़ना, उपेक्षा और शोषण की शिकायतें सुनने को मिलती रहती हैं। नतीजतन, इस तरह के बच्चे सजा पूरी करने के बाद सुधरने के बजाय और अधिक आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं। जाहिर है, इसके लिए सामाजिक व्यवस्था भी उतनी ही जिम्मेदार है। सुधरने की इच्छा रखने वाले बच्चों या व्यक्तियों को समुचित वातावरण देना भी हम सबका एक समाज के रूप मे कर्तव्य बनता है।

किसी भी सफल सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था में अपराधियों को समुचित सजा के साथ उनके उचित और आवश्यक पुनर्वास की ठोस व्यवस्था भी होनी चाहिए। आपराधिक प्रवृतियों को खत्म करना मुश्किल जरूर है, लेकिन उनका समूल निवारण भी संभव है। यह इसके लिए उत्तरदायी कारकों को समाप्त करके ही किया जा सकता है। अगर किसी बच्चे के बिगड़ने का नुकसान एक समाज के रूप में हमें उठाना पड़ता है तो उसके सुधरने का फायदा भी हमें ही होगा। (श्वेता शर्मा, कोलकाता)

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उपेक्षित किसान

कृषि भारतीय अर्थव्यस्था की रीढ़ है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सोलह प्रतिशत योगदान देने के साथ ही करीब पचास प्रतिशत लोगों को कृषि क्षेत्र में रोजगार भी मिलता है। देश का हर व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि से संबंध रखता है। भारत एक कृषि प्रधान देश जरूर है, लेकिन भारतीय कृषि विभिन्न समस्याओं से जूझ रही है। एक तरफ पर्यावरण और जैव-विविधता को सहेजने की चुनौती है, वहीं किसानों की अपनी समस्याएं हैं। वर्षा निर्भर कृषि होने के कारण मानसून की अनियमितता किसानों को दगा दे देती है, जिस कारण किसानों के समक्ष आजीविका और देश के सामने खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

इस वर्ष देश के छह सौ चालीस जिलों में से तीन सौ दो जिलों में औसतन बीस फीसद से कम बारिश हुई है, जबकि करीब पचास फीसदी हिस्से सूखे की चपेट में हैं। कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने लोकसभा में यह स्वीकार किया कि कर्नाटक, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समेत देश के नौ राज्यों के दो सौ से ज्यादा जिले सूखे से घोर प्रभावित हैं। बदलते समय के साथ कृषि संबंधी चुनौतियां बढ़ी हैं। भारतीय कृषि का स्वर्णिम दौर समाप्ति के कगार पर है। मृदा की घटती उर्वरता, घटता भूजल स्तर और महंगे होते कृषि-आगतों ने कृषकों के सामने एक नई समस्या पैदा की है।

इस तरह कृषि क्षेत्र में लागत और मुनाफे के बढ़ते अंतर ने किसानों को सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर किया है। मौसम की मार और ऊपर से सरकारी उपेक्षा ने किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया है। हर वर्ष किसान और खेती में सुधार के लिए ढेरों घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन धरातल पर कभी नहीं उतरतीं। कृषि प्रधान देश के लिए यह राष्ट्रीय शर्म की बात है कि यहां कई राज्य किसानों की आत्महत्या के मामले में पर्याय बन कर उभरे हैं। (सुधीर कुमार, बीएचयू, वाराणसी)

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संस्कृति के साथ

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसके चलते यहां विभिन्न प्रकार के लोगों का समावेशन है। भारत की संस्कृति जिन स्थानीय खासियतों और चीजों की वजह से जानी जाती थीं, वे अब वैश्वीकरण के दौर में गुम हो चुकी हैं। वर्तमान में जिस तरह हमारे रहन-सहन में विदेशी चीजें घुल-मिल रही हैं, उसमें हमारे देश की संस्कृति पश्चिमी देशों के मुकाबले कमजोर पड़ रही है। सांस्कृतिक रूप से पश्चिमी देश हमारी मानसिकता पर अपना आधिपत्य जमाने में कामयाब होते दिख रहे हैं। बर्गर, पिज्जा आदि खानपान की चीजों पर ज्यादा जोर किया जा रहा है।

आजादी के आंदोलन के दौरान प्रतीक बन चुका वह वह खादी वस्त्र और आज के आधुनिक फैशन के कपड़ों के बीच एक चौड़ी खाई दिखती है। 1992 के बाद देश में विदेशी बाजार को बढ़ावा मिला, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर से हमारी संस्कृति में और बदलाव आए, जिसके चलते लोगों का नजरिया बदल गया। संस्कृति के नजरिए से देखें तो इस दशक का प्रभाव दीर्घकालिक होगा। (मो कामिल, दिल्ली)

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दोस्ती के रास्ते

देर से सही, लेकिन लगता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ दुरुस्त आए हैं। उन्होंने अपने मंत्रियों को भारत के खिलाफ नहीं बोलने की नसीहत देकर यह जताने की कोशिश की है कि वे संबंधों को सुधारने के इच्छुक हैं। उनका समझना कि पुरानी बातों से बात बनने वाली नहीं है, सकारात्मक है। हालांकि पाकिस्तान के सैन्य शासक रहे परवेज मुशर्रफ ने भी ऐसे संकेत दिए थे, मानो वे बदल रहे हों। लेकिन बाद में नतीजा सकारात्मक नहीं निकल सका। दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाना है तो पाकिस्तान ही क्यों, भारत के राजनेताओं को भी ऐसे बयान देने से बचना चाहिए, जिनसे दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट पैदा होती हो। (शुभम सोनी, इछावर, मप्र)

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