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अपराध की दहलीज

एक स्वतंत्र न्यायपालिका वाले लोकतांत्रिक देश में निर्भया कांड के दोषी नाबालिग (अब बालिग) की रिहाई पर लोगों का आवेश में आकर यह कहना कि ‘जुर्म जीत गया,कानून हार गया’ तर्कसंगत मालूम नहीं पड़ता..

Author नई दिल्ली | Updated: December 29, 2015 6:45 PM
उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)

एक स्वतंत्र न्यायपालिका वाले लोकतांत्रिक देश में निर्भया कांड के दोषी नाबालिग (अब बालिग) की रिहाई पर लोगों का आवेश में आकर यह कहना कि ‘जुर्म जीत गया,कानून हार गया’ तर्कसंगत मालूम नहीं पड़ता। देश में कानून का शासन है और यह भावनाओं से नहीं चलता। अन्यथा इसकी प्रासंगिकता कब की खत्म हो चुकी होती। कानून के तहत सभी नागरिक समान हैं। सबके हितों की रक्षा करना न्यायालय का प्रमुख कर्तव्य है।

किशोर न्याय कानून के पूर्व के प्रावधानों के मुताबिक दोषी की रिहाई होनी ही थी। फिर हंगामा क्यों? सवाल उम्र का नहीं है। सवाल यह है कि बीते एक दशक में ऐसा क्या हुआ कि किशोरों में आपराधिक प्रवृत्तियां हावी होती जा रही हैं? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2001 से 2011 के बीच बाल अपराध में बढ़ोतरी हुई है। देशभर में सत्रह लाख किशोर विभिन्न आपराधिक मामलों में आरोपी हैं। सामाजिक भटकाव के कारण किशोर चोरी, हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार जैसे अपराधों में भी शामिल हो रहे हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए समाज और सत्ता को सोचना होगा। केवल किशोरों से संबंधित कानून में संशोधन करने से बात नहीं बनेगी। किशोरों के मानसिक भटकाव के लिए हमारा समाज और विषाक्त सामाजिक माहौल बराबर का दोषी है। हमारा सामाजिक परिवेश दिनोंदिन बदलता जा रहा है। संयुक्त परिवार के विखंडन के कारण बच्चे परंपरागत पालन-पोषण से दूर हो गए हैं। आज के तथाकथित आधुनिक बच्चे अपने माता-पिता या दादा-दादी के पास जाकर बात करने या कहानी सुनने के बजाय सोशल मीडिया पर चैटिंग करना पसंद कर रहे हैं। कहीं न कहीं इस विषैले सामाजिक परिवेश में छोटे-छोटे बच्चों का बचपन भी छिनता जा रहा है, जिसे शायद हम नजरअंदाज कर रहे हैं।

अभिभावकों के संरक्षण के अभाव और वंचना में पलते बच्चों को कम उम्र से ही वीडियो गेम, टीवी, इंटरनेट, नशाखोरी और अश्लील फिल्मों की लत लग रही है। टीवी, सिनेमा और मोबाइल फोन की सुलभता छोटी उम्र से ही किशोरों में तनाव, ईर्ष्या और अवसाद की प्रवृतियों को जन्म दे रही है। बच्चे बहुत जल्द परिपक्व तो हो रहे हैं, लेकिन उन्हें आवश्यक मूल्यों, नैतिकता और मानवता का ज्ञान नहीं मिल रहा। ऐसे में दोषी केवल किशोर नहीं है, बल्कि माता-पिता सहित पूरा समाज जिम्मेदार है। नैतिक शिक्षा को एक विषय के रूप में पाठ्य-पुस्तक में शामिल करने की चर्चा रही है। लेकिन क्या यह काफी है? क्या इसकी शुरुआत मानव जीवन की प्रथम पाठशाला यानी घर और आसपास के समाज से नहीं की जानी चाहिए? (सुधीर कुमार, बीएचयू, वाराणसी)

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तरक्की का रास्ता
विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट में भारत को छोड़ कर बाकी सभी उभरते बाजारों की वृद्धि में नरमी की बात कही गई है। यह रिपोर्ट हमें इस बात की राहत देती है कि जहां चीन और रूस जैसे ‘ब्रिक्स’ के मजबूत सदस्य देशों की आर्थिक वृद्धि चिंताजनक बनी हुई है, वहीं फिलहाल हम इस सुस्ती की गिरफ्त से बाहर हैं। उम्मीद है कि सरकार की निवेश आकर्षण की योजनाएं और केंद्रीय बैंक के वर्तमान मौद्रिक रुझान के सहारे इसे बरकरार रखा जा सकेगा।

लेकिन इसके साथ ही सरकार को महंगाई और सूखे के कारण देश भर में फैली एक आर्थिक निराशा के माहौल को सुधारना बेहद जरूरी है। किसानों की बढ़ती चिंता को सरकार अपनी प्राथमिकता में दर्ज करे और जल्दी ही उनकी समस्या का समाधान निकाले। तभी देश और तरक्की के रास्ते पर जा सकता है। (अब्दुल्लाह कुरैशी, जोधपुर)

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दो ध्रुव
एक समाचार सुन कर हैरानी हुई कि बुंदेलखंड में लोग घास की रोटी खाने को मजबूर हैं। ऐसी भयावह स्थिति सुन कर मन को धक्का लगा। उन लोगों को महीनों तक दाल नहीं मिलती, दूध का अभाव है। ऐसा क्यों है? ऐसे लोगों के लिए गरीबी कब तक अभिशाप बनी रहेगी? उनकी दयनीय स्थिति देख कर मन दुखी होता है। क्या आजादी के इतने सालों बाद भी अच्छा खाना, अच्छा कपड़ा, अच्छा घर, अच्छी पढ़ाई और बुनियादी जरूरतों पर केवल अमीरों का अधिकार है? सच यह है कि अमीरी भी गरीबों का हक छीन कर पनपती है।

देश में कितना पैसा लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकायों आदि के चुनावों में बर्बाद हो जाता है! कितने पैसे अमीर लोग अपने शौक फरमाने में बर्बाद करते हैं! अगर सभी लोग अपनी जीवन-शैली में बदलाव ले आएं, फिजूलखर्ची पर लगाम कस लें तो उसका इस्तेमाल ऐसे लोगों की गरीबी दूर करने में हो सकता है जो दो जून की रोटी के लिए तरसते हैं। अगर सभी राजनीतिक दल, देश के उच्च पदासीन नेता और अधिकारी अपनी जेब भरना छोड़ दें, सामाजिक कल्याण की सोचें तो इस देश से गरीबी का उन्मूलन कोई असंभव बात नहीं है। (सीमा श्रोत्रिय, निर्माण विहार, दिल्ली)

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गणित की जगह
‘गणित में पिछड़ती भारतीय मेधा’ (25 दिसंबर) के अंक में प्रकाशित लेख पढ़ा। पहले भले ही गणित को एक नीरस विषय माना जाता रहा हो, लेकिन आज के हालात में दुनिया गणित के कायदों पर घूम रही है। इस वक्त पूरी दुनिया में युवा गणितज्ञों की मांग बढ़ रही है। हमारा देश गणित ज्ञान के उर्वर देश के रूप में अपनी पहचान कायम कर चुका है। आज रोजगार के क्षेत्र में सृजन के नए आयाम खोजे जा रहे हैं। तमाम तरह की योजनाएं देश को विकास की दुनिया में अग्रगामी बना रही हैं। बेहतर होता अगर सूचना क्रांति को गणित से जोड़ कर एक नए फार्मूले को विकसित किया जाता, जिसमें गरीबी मिटाने का साहस निहित हो। (रंजीत कुमार झा, विजय नगर, नई दिल्ली)

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